“विभाजन की विभीषिका से विस्थापन की अमर गाथा” विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न

सिंधी समाज के विस्थापन, सांस्कृतिक स्मृति और साहित्य को नए अकादमिक दृष्टिकोण से पढ़ने का आह्वान — सिंधु शोध पीठ में विभाजन साहित्य, मौखिक इतिहास और अनुवाद पर शोध की संभावनाएं उभरीं

अजमेर।  मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि विभाजन की सबसे बड़ी क्षति सांस्कृतिक जड़ों का टूटना था।  भाषा, क्षेत्र एवं सांस्कृतिक स्मृति के विलोपन के कारण जिस तरह से सिंधी समुदाय हाशिये पर आ गया और उसके पश्चात जिस प्रकार सिंधु समुदाय में विकास किया वह प्रेरणास्पद है

सारस्वत अतिथि डॉ. राजेश व्यास ने विभाजन को मानवीय संवेदना और सांस्कृतिक इतिहास के व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता बताई। डॉ. व्यास ने कहा कि विभाजन से केवल घर, जमीन और संपत्ति नहीं छूटी, बल्कि अनेक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल भी भारत की प्रत्यक्ष पहुंच से बाहर हो गए। उन्होंने शारदा पीठ, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, प्रह्लादपुरी, विभिन्न मंदिरों और सांस्कृतिक स्थलों का उल्लेख करते हुए कहा कि विभाजन की त्रासदी को सांस्कृतिक विरासत के नुकसान के संदर्भ में भी समझने की आवश्यकता है।  सिंधु समाज के विस्थापन, सांस्कृतिक स्मृति और साहित्य को नए अकादमिक दृष्टिकोण से पढ़ने की आवश्यकता है। सिंधु विभाजन साहित्य में शोध की अपार संभावनाएं हैं। सिंधी विभाजन साहित्य के अध्ययन हेतु एक विशेष मॉडल विकसित किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने शारदा पीठ को भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र बताते हुए कहा कि उसके अध्ययन और इतिहास को व्यापक अकादमिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

विशिष्ट अतिथि श्री सुरेश सिंधी ने विभाजन की अपनी पारिवारिक स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि विभाजन की त्रासदी केवल सीमा पार करने तक सीमित नहीं थी। उनके परिवार ने सिंध में संपत्ति और सामाजिक स्थिति खोई, विस्थापन के बाद आर्थिक संघर्ष झेला और नई परिस्थितियों में जीवन फिर से खड़ा किया।

संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने विभाजन की पीड़ा को शोध के एक नए अकादमिक विषय के रूप में देखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विभाजन के बाद पंजाब, बंगाल और सिंध से आए लोगों के अनुभवों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाना चाहिए, क्योंकि सिंधी समाज के मामले में केवल भौगोलिक विस्थापन नहीं हुआ, बल्कि उसकी भूमि, भाषा और सांस्कृतिक स्मृति पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। विभाजन केवल सीमाओं के बदलने की घटना नहीं थी, बल्कि उसने करोड़ों लोगों के जीवन, उनकी स्मृतियों, भाषाओं, सांस्कृतिक जड़ों और सामाजिक पहचान को प्रभावित किया।

उन्होंने सिंधी समाज के संदर्भ में “पोर्टेबल होमलैंड” की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि विस्थापित समुदाय अपनी सांस्कृतिक स्मृति को अपने साथ लेकर नई जगहों पर पहुंचा। उन्होंने इस बात पर भी ध्यान आकर्षित किया कि पहली पीढ़ी की स्मृति धीरे-धीरे दूसरी और तीसरी पीढ़ी की “पोस्ट-मेमोरी” में परिवर्तित हो रही है। प्रो. अग्रवाल ने कहा कि सिंधी विभाजन साहित्य को मुख्यधारा के पाठ्यक्रमों में पर्याप्त स्थान नहीं मिला है। उन्होंने सिंधी साहित्य और विभाजन साहित्य के व्यापक संकलन, अध्ययन तथा अनुवाद की आवश्यकता जताई।

कुलगुरु प्रो. अग्रवाल ने राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर के विचार का संदर्भ देते हुए कहा कि जो राष्ट्र अपनी पीड़ा और अपने अतीत के गौरव को स्मरण नहीं करता, वह गौरवशाली भविष्य की ओर नहीं बढ़ सकता।

विषय प्रवर्तन सिंधु शोध पीठ के निदेशक प्रो. सुभाष चंद्र ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ सूरज मल राव ने किया तथा आभार ज्ञापन कुलसचिव एवं वित्त नियंत्रक सुश्री नेहा शर्मा ने किया | कार्यक्रम मे विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी, अतिथि शिक्षक, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या मे विद्यार्थी सहित सिंधी समाज के गणमान्य नागरिक तथा सिंधी भाषा प्रमाणपत्र कार्यक्रम में प्रवेश ले चुके विद्यार्थी भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम से पूर्व “ऑपरेशन सिंदूर” पर आधारित लघु फिल्म का प्रदर्शन हुआ तथा राजस्थान आर्टिलरी एनसीसी, अजमेर के कैडेट भी उपस्थित रहे।

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