रंग तो बदलाव के ही अच्छे….
बात उस दौर की है जब अजमेर शहर ऑर्गेनाइज क्राइम से जकड़ा हुआ था। हर ओर हाहाकार के हालात थे। जुए सट्टे की फड़ें आबाद थीं। ऐसी लाइनें लगती थीं मानों राशन की दुकान पर भीड़ जमा है। सभी टॉकीजों के इर्द गिर्द गिरोहों का जमावड़ा हुआ करता था। सिनेमा घर दरअसल टिकटों की कालाबाजारी … Read more