*उम्मीदों का शव*
यह 2013 का वर्ष था । राष्ट्रवाद का नया अवतार आकार ले रहा था। तात्कालिक सरकार अपने नेतृत्व, नीति और नियामकों को लेकर दिग्भ्रमित थी। विपक्ष अवसर की ठीक तलाश में था कि तभी दिल्ली की सड़कों पर एक आंदोलन उभरा और देखते-देखते देश की आवाज बन गया। बिल्कुल शुरू में गांधी … Read more