आनासागर पर अब माथापच्ची, पहले मूकदर्शक क्यों बने बैठे थे?

ऐतिहासिक झील आनासागर की भराव क्षमता को लेकर अब माथापच्ची हो रही है, प्रशासन भी पशोपेश में है, मगर तब सब मूकदर्शक बने बैठे थे, जब प्रभावशाली लोग भराव क्षेत्र में नियमों की अवहेलना कर धड़ाधड़ मकान खड़े करते जा रहे थे। जिन अफसरों पर इस पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी थी, वे भी जेबें भरने में लगे रहे। कैसी विडंबना है?
असल में यह बहस इस कारण शुरू हुई है कि इस बार बरसात के पानी की आवक होने से झील का गेज वर्तमान में 11 फीट पार करने को है। विश्राम स्थली के करीब 25 फीसदी हिस्से में पानी भर चुका है। पानी का फैलाव आनासागर सरक्यूलर रोड के किनारे छूने लगा है। रीजनल कॉलेज व एमपीएस स्कूल की ओर पानी सड़क के नजदीक पहुंच चुका है। झील के पेटे में आवासन मंडल तथा यूआईटी द्वारा बसाए गए आवासों में पानी का रिसाव शुरू हो चुका है। आबादी इलाकों में आए इस पानी को वापस झील में डालने के लिए पंप सेट लगाने पड़े हैं। झील अपनी कुल भराव क्षमता 13 फीट तक पहुंची तो विश्राम स्थली के अधिकांश हिस्से में पानी भर जाएगा। अरिहंत कॉलोनी और महावीर कॉलोनी के ड्रेनेज और सीवर सिस्टम से पानी घर के अंदर तक जा पहुंचेगा। वैशाली नगर, सागर विहार, मूक बधिर विद्यालय, जनता कालोनी, रीजनल कॉलेज परिसर, एमपीएस स्कूल परिसर, सरक्यूलर रोड, क्रिश्चनगंज, आनंद नगर, बीएसएनएल कॉलोनी तक पानी का भराव हो सकता है। काजी का नाला, आंतेड़ नाला, चौरसियावास नाला समेत बाडी नदी में भी पानी का भराव हो जाएगा। ऐसे में सवाल ये उठ खड़ा हुआ है कि खतरे की जद में आए इन मकानों को नजरअंदाज कर पानी पूरा भरने दिया जाए या फिर 12 फीट होते-होते चेनल गेट खोल कर पानी बहने दिया जाए।
बेशक आनासागर झील हमारी ऐतिहासिक और सुरम्य धरोहर है। उसकी संरक्षा लाजिमी है। आज जब प्रकृति की कृपा से इसमें पानी आ गया है तो यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि कितनी भराव क्षमता तक पानी भरने दिया जाए और कब चेनल गेट खोल कर पानी निकाला जाए। कुछ लोग कह रहे हैं कि झील को पूरी क्षमता तक भरा जाना चाहिए, इसमें किसी प्रकार का किंतु परंतु होना ही नहीं चाहिए। यह झील के सौंदर्य का सवाल है। चाहे डूब में आने वाले मकानों के बचाव के दूसरे उपाय किए जाएं। कोई कह रहा है कि देश की सबसे बेहतरीन झील में पानी का भराव इसलिए नहीं रोका जाए कि कुछ लोगों को खतरा हो सकता है। कुछ लोगों की परेशानी ज्यादा मायने नहीं रखती है।
जाहिर है ऐसे में प्रशासन पशोपेश में है कि आखिर क्या करे। उसके सामने दो प्रस्ताव हैं। झील को पूरे 13 फीट गेज तक भरने दिया जाए या झील का गेज 12 फीट से अधिक नहीं होने दिया जाए। एक फीट का मार्जिन रखा जाए। इससे अधिक पानी को चैनल गेट के माध्यम से एस्केप चैनल में डाल दिया जाए। समझा जाता है कि प्रशासन भी 12 फीट लेवल तक तो किसी प्रकार की छेड़छाड़ करने के पक्ष में नहीं है, लेकिन इसके बाद कलेक्टर की सदारत में गठित कमेटी के निर्णय पर तय होगा कि पानी का लेवल कहां तक रखा जाए। उपाय ये किया जाएगा कि चेनल गेट को धीरे-धीरे खोला जाएगा, क्योंकि पानी की निकासी होती है तो पाल बीछला व आगे के आबादी इलाकों में पानी का दबाव बढ़ जाएगा।
अव्वल तो सच ये है कि सन् 1975 की बाढ़ से पहले झील की भराव क्षमता 16 फीट थी। वह आज 13 फीट ही रह गई है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? आंख मीच कर अवैध मकान बनाने वाले? मकान बनते देख आंख मीच कर बैठे जिम्मेदार अफसर? मकान बनने के बाद उन्हें नियमित करने की पैरवी करने वाले राजनीतिज्ञ? या फिर वोटों की खातिर अवैध को वैध करने का रास्ता निकालने वाली सरकार? असल में ये सभी जिम्मेदार हैं। न लोगों को नियमों की परवाह है और न ही सरकार में सख्ती जैसी कोई बात। हर निर्णय के पीछे राजनीति आ जाती है। विशेष रूप से अजमेर में न तो कभी सशक्त राजनीतिक नेतृत्व रहा और न ही अफसर मुस्तैद। अधिकतर राजनेता शहर की कम अपनी ज्यादा सोचते हैं और अफसर तो अमूमन इस जमीन को चरागाह ही समझते हैं। और इसी कारण ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं, जिन पर बाद में सियापा करने के सिवाय कोई चारा नहीं बच जाता।
-तेजवानी गिरधर

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