किशनगढ़ की राजनीति का नया दौर शुरू, क्या बलदलेंगे मिथक ?

मदनगंज-किशनगढ़। 13वीं विधानसभा के लिए हुए चुनाव में अजमेर जिले में एक ओर जहां अजमेर, ब्यावर, पुष्कर, नसीराबाद, केकड़ी व मसूदा में पार्टियों ने अपनी अपनी जीत दर्ज की है तो दूसरी ओर किशनगढ़ में आजादी के बाद पहली बाद निर्दलीय प्रत्याशी से अप्रत्याशित जीत दर्ज कर दोनों ही पार्टियों को आईना दिखा दिया है।
गौरतलब है कि किशनगढ़ में विगत 20 वर्षों से भाजपा-कांग्रेस एक ही जाति से अपना उम्मीदवार उतारती रही है, जिसके पीछे यहां का जातिगत आंकड़ा अहम कारण रहा है। इसके बल पर ही दोनों पार्टियों ने दो दो बार अपने विधायक भी बनाए हैं। किन्तु इसके कारण किशनगढ़ विधानसभा क्षेत्र में एक जाति विषेश के प्रति लोगों की राजनीतिक सोच कुण्ठाने लगी जिसे दूर करने के लिए दोनों ही पार्टियां कसमसाती प्रतीत होती रही किन्तु जातिगत आंकड़े के कारण हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। इसी सोच के चलते इस बार भी भाजपा ने वर्तमान विधायक से कार्यकर्ताओं की नाराजगी को देखते हुए अन्य जाति के प्रबल दावेदार सुरेश टाक को नजरन्दाज करते हुए नए चेहरे विकास चौधरी को प्रत्याशी घोषित किया। जिसके कारण पार्टी को खुद अपने ही कार्यकर्ताओं व आम जनता के विरोध के कारण जीती हुई सीट गंवानी पड़ी। इसी प्रकार कांग्रेस में पिछले 20 सालों से पार्टी का चेहरे बने नाथूराम सिनोदिया को अषोक गहलोत का समर्थक होने का खामियाजा उठाना पड़ा और सचिन पायलट के चहेते नन्दाराम थाकन को मैदान में उतारा गया जिसके प्रत्याशी घोषित होने के साथ ही हार निष्चित मान ली गई। किन्तु जातिगत समीकरण में नहीं बैठने के कारण यहां से प्रबल दावेदार राजूगुप्ता का टिकट काटकर पायलट ने अपने बी प्लान पर काम करते हुए भाजपा से नाराज बैठे सुरेश टाक को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतारकर हारी हुई बाजी को जीतने की योजना बनाकर बाजी अपने पक्ष में कर ली। इसकी पुष्ठी इस बात से भी होती है कि पूरे विधानसभाक्षेत्र मे गूर्जर बाहुल्य क्षेत्रों में टाक को बढ़त मिली। क्योंकि गूर्जर जाति परम्परागत रूप से सचिन पायलट के पक्ष में एकजुट रही है। इसके अतिरिक्त गूर्जर बाहुल्य क्षेत्रों में स्वयं टाक ने भी देवजी के मंदिरों में सरकार बनने मे जरूरत पड़ने पर सचिन पायलट के पक्ष में जाने का आश्वासन दिया जिससे गूर्जर मतों में बिखराव नहीं हो पाया और इन्होंने कांग्रेस का दामन छोड़ निर्दलीय का हाथ थाम लिया। साथ ही माली, कुमावत, वैश्य सहित अन्य जातियों के समर्थन के चलते टाक को इस ऐतिहासिक कारनामे में सफलता प्राप्त हो सकी।
बहरहाल निर्दलीय सुरेश टाक को सर्वसमाज का साथ मिला और बिना किसी पार्टी के चिन्ह के अपनी ऐतिहासिक जीत दर्ज कर यह साबित कर दिया कि यदि जनता चाहे तो पार्टी के न चाहने पर भी जातिवाद का सामना किया जा सकता है। इससे किशनगढ़ की राजनीति में एक नए दौर की शुरूआत कही जा सकती है। क्योंकि इससे दोनों ही पार्टियों के जातिवाद के मिथक को तोड़ने के साथ ही जातिगत वोटों के गणित के तमाम आंकड़ों को नकारा जा सकता है। इससे यह भी साबित होता है कि अब आने वाले समय में यहां के चुनाव पार्टिवाद पर नहीं बल्कि व्यक्तिवाद पर भी लड़े जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त यह भी तय है कि आने वाले समय में किशनगढ़ की राजनीति करवट लेकर बदलाव की ओर अग्रसर होगी। तथा राजनीति की नया दौर शुरू होगा जिससे यहां के बिगड़ते हालातों पर कुछ हद तक लगाम लगाई जा सकेगी।
-बिरदीचन्द ‘मालाकार’
संपादक,अजितंजय समाचार मित्र
किशनगढ़, मो. नं.: 9214797344

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