किशनगढ़ के निर्दलीय विधायक टाक के सामने है धर्मसंकट

हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा से बगावत करके निर्दलीय रूप में जीते किशनगढ़ के विधायक सुरेश टाक, भले ही खुश हो लें कि उनकी विधायक बनने की इच्छा पूरी हो गई, मगर सरकार कांग्रेस की बनने के कारण वे धर्मसंकट में हैं। अगर आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ देते हैं तो किशनगढ़ के विकास के लिए सरकार का अपेक्षित सहयोग नहीं ले पाएंगे और अगर कांग्रेस का साथ देते हैं तो उनका खुद का भाजपाई जनाधार ही खो जाएगा।
भले ही वे निर्दलीय रूप से चुने गए हैं, मगर यह सच है कि उन्हें अधिसंख्य वोट भाजपा मानसिकता के ही मिले होंगे। जीत इस कारण गए क्योंकि पूरा शहर लगभग एकजुट सा हो गया। कांग्रेस विचारधारा के शहरी वोटर ने भी उनका साथ दिया ही होगा। किशनगढ़ वासियों की लंबे समय से यह इच्छा रही कि कोई गैर जाट जीत कर आए, मगर दोनों ही दल जातीय समीकरण के तहत जाट को ही प्रत्याशी बनाते रहे। ऐसे में हर बार जाट ही जीत कर आता, कभी कांग्रेस का तो कभी भाजपा का। चूंकि विधायक देहात पृष्ठभूमि के होते थे, इस कारण उनकी उतनी रुचि शहर में नहीं होती थी, जितना कि शहर वासी अपेक्षा करते थे।
इस बार कांग्रेस व भाजपा, दोनों ने जाट को ही टिकट दिया तो टाक को निर्दलीय रूप में मैदान में उतर कर त्रिकोण बनाने का मौका मिल गया। संयोग ऐसा हुआ कि पूर्व कांग्रेस विधायक नाथूराम सिनोदिया भी बागी बन गए और मुकाबला चतुष्कोणीय हो गया। टाक ने 17452 मतों से जीत दर्ज की। टाक को 82678, भाजपा के विकास चौधरी को 65226, निर्दलीय नाथूराम सिनोदिया को 22851, कांग्रेस के नन्दाराम को 15157 वोट मिले। यदि सिनोदिया व नंदाराम के वोटों को जोड़ लिया जाए तो भी आंकड़ा टाक व चौधरी को मिले वोटों से कम बैठता है। उसकी वजह साफ है कि शहर की हवा के साथ बहे कांग्रेसी वोट भाजपा मानसिकता के टाक की झोली में पड़ गए।
खैर, अब टाक के सामने धर्मसंकट ये है कि वे करें क्या? एक ओर विधानसभा क्षेत्र के विकास की समस्या है तो दूसरी ओर भाजपा मानसिकता के मतदाताओं की नाराजगी का खतरा। हालांकि होना ये है कि लोकसभा चुनाव में वे जो कुछ करें, मगर वोटों का बंटवारा विशुद्ध रूप से पार्टी के आधार पर हो जाएगा। जिन शहरी कांग्रेसी मतदाताओं ने टाक को वोट दिए, वे अब वापस कांग्रेस का रुख करेंगे। वो तो शहर के नाम पर टाक के साथ हुए थे, मगर अब वे स्वतंत्र हैं।
हालांकि जब टाक जीते तो मतगणना के तुरंत बाद उनसे पूछा गया कि वे किसका साथ देंगे तो उन्होंने डिप्लोमेटिक जवाब दिया कि परिस्थिति के अनुसार देखा जाएगा। परिस्थिति ऐसी बनी कि कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए निर्दलियों की उतनी जरूरत नहीं रही। अगर आंकड़ा कुछ कम होता तो कदाचित कांग्रेस का साथ दे कर कुछ हासिल कर सकते थे, जैसे पिछली बार ब्रह्मदेव कुमावत ने किया और संसदीय सचिव बन गए। उनके लिए तो फिर भी आसान रहा क्योंकि वे कांग्रेस पृष्ठभूमि से थे और सरकार भी कांग्रेस की ही बनी। लेकिन टाक के लिए यह आसान नहीं, क्योंकि उन्हें तो ऐसा करने के लिए पाला ही बदलना पड़ेगा। पिछले दिनों अन्य निर्दलियों के साथ जब वे सरकार से मिले तो सवाल उठा कि क्या वे कांग्रेस की ओर झुकाव रखने जा रहे हैं, इस पर उन्हें साफ करना पड़ा कि उनकी रुचि क्षेत्र के विकास में है और चूंकि सरकार कांग्रेस की है तो उनसे तो मिलना ही पड़ेगा।
बहरहाल, जब सरकार बनाने वाली पार्टी के पास बहुमत का आंकड़ा कम होता है तो निर्दलियों की बल्ले-बल्ले हो जाती है, मगर यदि ज्यादा गरज नहीं हो तो निर्दलियों का हाल वैसा ही हो जाता है, जैसा कि सुरेश टाक का।

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