देश प्रेम के रंग से बदरंग हो गई जि़ंदगी

कुतबुददीन
अजमेर। कपड़ों पर पक्का रंग चढ़ाने के लिए मश्हूर रहे रंगरेज़ कुतबुददीन ख़्िालजी को देश की सेवा करने और देश के दुश्मन पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों का पता लगाकर अपने देश को देने का जुनून ऐसा सवार हुआ कि उनकी पूरी जि़ंदगी बदरंग होकर रह गई। लगभग सत्तर साल के करीब पहुँच चुके कुतबुददीन ख़्िालजी पिछले पैंतालिस सालों से लगातार राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, ग्रहमंत्रालय, राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर विभिन्न विभागों के सचिवों तक पत्र लिख लिख कर इंसाफ की गुहार लगा रहे हैं मगर किसी दर पर उन्हे अभी तक इंसाफ नहीं मिला है। कुतबुददीन ख़्िालजी की अजमेर के स्टेशन रोड पर मोईनिया इस्लामिया स्कूल के सामने भारत डायर्स के नाम से पुरानी दुकान है। खतम हो चुके कारोबार और ढलती उम्र के बावजूद $िखलजी ने हार नहीं मानी है और उन्हे उम्मीद है उनकी आखिरी संास तक भारत सरकार उनकी फरीयाद सुन ही लेगा। $िखलजी बताते हैं कि 1971 में उन्हे गुप्तचर विभाग में नौकरी पर रखा गया था और कुछ समय बाद उनका संबंध गुप्तचर एजेंसी रॉ के अफसरों से हुआ। ख़्िालजी को ज्योग्राफी विषय में रुचि रही है और वो कागज़ पर क्षेत्र का नक्शा बाखू़बी बना लेते हैं। इसी $खूबी के चलते रॉ के अफसरों ने सत्तर के दशक में $िखलजी को तारागढ़ पहाड़ी पर बैठाकर अजमेर का नक्शा बनवाया। $िखलजी ने बताया कि कागज़ पर बिलकुल सही नक्शे को देख रॉ के अफसरों ने उन्हे एक गुप्त मिशन पर पाकिस्तान भेजने की जानकारी दी और कहा कि वहां के सैन्य ठिकानों का पता लगाकर उनका चित्र बनाकर लाना है। इस मिशन के लिए घर पर भी चर्चा नहीं की गई और $िखलजी को पांच अन्य लोगों के साथ जोधपुर के रास्ते बाड़मेर से पाकिस्तान बॉर्डर पार करा दी गई। $िखलजी ने बताया कि उन्होने लाहौर, इस्लामाबाद के सैन्य ठिकानों का छुपकर पता लगाया और कागज़ पर नक्शे बनाए। $िखलजी ने बताया कि लौटते हुए उनके साथ गुप्तचर ने धोखा दिया और एक रेगिस्तान में बिठाकर लौटकर आने को कह गया और फिर नहीं लौटा इस बीच $िखलजी को पाक पुलिस ने पकड़ लिया।
मुजफ्फर अली
पाक पुलिस ने $िखलजी को लाहौर जेल में बंद कर दिया और उनके सामान का ज़ब्त कर लिया जिसमें पाक सैन्य ठिकानों के नक्श्ेा भी थे। पाक जेल में रहते $िखलजी को यातनाएं दी गईं और उनके खिलाफ गंभीर जुर्म बनाया गया । $िखलजी ने बताया कि जेल में उन्होने एक अफसर को आठ हजार की रिश्वत दी जिसकी वजह से उस अफसर ने उनका केस हल्का किया और उनके कागजात को जलाकर सबूत नष्ट कर दिए। 1973-74 में बंगलादेश बनने के समय भारत पाक के बीच शिमला समझौते के तहत एक दूसरे देश की जेलों में बंद कैदीयों की रिहाई के समय $िखलजी को भी छोड़ा गया और भारत भेज दिया गया। इस दौरान $िखलजी की पत्नि नन्ही बेगम अपने पति को ढूंढती रही और गुप्तचर विभाग के चक्कर लगाती रही लेकिन किसी ने उसे नहीं बताया कि उनका पति पाकिस्तान में है। पौने चार साल बाद $िखलजी जब वापस अपने घर पहुँचें तो घर का हाल देखकर दंग रह गए। उनकी पत्नि नन्ही बेगम बेहद बुरी स्थिती में थी, ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह में बंटने वाले सुबह शाम लंगर लाकर अपने बच्चों को पिलाकर गुजारा कर रही थी। $िखलजी को देख पत्नि और बच्चों के चेहरों पर खुशी लौट आई। लेकिन $िखलजी को दुख इस बात का था कि उनके पीछे उनके घर को संभालने का जो वायदा किया गया था वो पूरा नहीं हुआ। $िखलजी दूसरे ही दिन गुप्तचर विभाग गए तो पिछले तीन चार सालों में अफसर बदल चुके थे और उन्होने $िखलजी को पहचानने से इंकार कर दिया यहाँ तक कि उन्हे बताया गया कि उनका कोई रिकार्ड दफतर में नहीं है। $िखलजी ने तभी से गुप्तचर विभाग और रॉ मुख्यालय को लगातार अपनी कहानी सुनाई और उन्हे आर्थिक सहायता मुहैया कराने की गुहार की लेकिन हर बार उन्हे आश्वासन ही मिलता रहा। विभागिय सहायता नहीं मिलती देख खिलजी ने अपने हमदर्दों के साथ स्वंय जाकर राष्ट्रपति कार्यालय में अपनी गुहार लगाई वहां भी उनसे कागजात रख लिए और कार्यवाही का आश्वासन दिया गया। $िखलजी ने जब कोई सहायता की उम्मीद नहीं देखी तो न्यायालय का सहारा लिया और अजमेर सेशन कोर्ट में वाद दायर कर दिया। कोर्ट में सरकारी तौर पर कोई जवाब पेश नहीं किया गया और वाद खारिज हो गया तो $िखलजी हाईकोर्ट गए वहां भी सरकारी जवाब के लिए कोई नहीं आया तो कोर्ट ने अपील खारिज कर दी। $िखलजी फिर भी नहीं हारे और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो वर्ष 2004 में सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ न्यायधीशों की बेंच ने सुनवाई के बाद उनकी अपील को डिसमिस कर दिया। $िखलजी के पास दस्तावेजी कोई सबूत नहीं होना उनकी राह में सबसे बडी बाधा बनी है। लेकिन उनके पास लगातार विभागों से प्राप्त जवाबी पत्रों का ढेर इकटठा हो चुका है। वर्ष 2006 में राष्ट्रीय न्यूज चैनल आज तक के क्राईम रिपोर्टर शम्स ताहिर खान ने $िखलजी की कहानी को चैनल पर प्रसारित भी किया। आज $िखलजी अपनी दुकान पर पेड़ की जड़ों से उभर आई अरबी में अल्लाह की आकृति के फोटोज़ बेचकर गुजारा कर रहे हैं। दुकान पर ही उनकी पत्नि नन्ही बेगम बूढ़ी होती काया और कमज़ोर नज़र के बावजूद पति के साथ बैठकर दरियों, शालों, कालीनों या कपड़ों के किनारों पर लगने वाली डोरों के फुदने बनाती हैं। उनका बेटा अब्बास अब सैतीस बरस का हो गया है और ड्राईवरी करता है। $िखलजी कहते हैं कि नज़र कमज़ोर हो गई है और कानों में सुनाई भी कम देता है लेकिन उम्मीद कम नहीं हुई है। $िखलजी की अब यही इच्छा है कि भारत सरकार उनके बेटे को कहीं नौकरी दे दे। $िखलजी कहते हैं कि जब सरबजीत के परिवार को नौकरी और आर्थिक सहायता दी जा सकती है तो मुझे क्यूं नहीं ?
-मुज़फ्फर अली,
जैसा कि कुतबुददीन िखलजी ने बताया।

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