हाड़ा के अध्यक्ष बनने से बिगड़ा भाजपा का जातीय समीकरण

अजमेर। बेशक भाजपा हाईकमान ने पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी के चहेते रमेश सोनी व पूर्व महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल की पसंद आनंद सिंह राजावत को दरकिनार करते हुए डॉ. प्रियशील हाड़ा को शहर भाजपा अध्यक्ष बना कर दोनों क्षत्रपों को झटका दिया है और गुजबाजी को खत्म करने की कोशिश की है, लेकिन इससे शहर में भाजपा का जातीय समीकरण बिगड़ गया है। शहर की एक विधायक की सीट पर सिंधी के रूप में देवनानी का कब्जा है तो दूसरी सीट पर कोली जाति की श्रीमती भदेल काबिज हैं। तीसरे महत्वपूर्ण पद मेयर की सीट भी अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित है। वर्तमान में मेयर की सामान्य सीट पर ओबीसी के धर्मेन्द्र गहलोत बैठे हुए हैं और डिप्टी मेयर की सीट पर भी ओबीसी के संपत सांखला को बैठा रखा है। ऐसे में सामान्य वर्ग को पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया गया है। जिला प्रमुख का पद सामान्य के लिए आरक्षित है, मगर उसे शहर में शामिल नहीं माना जा सकता।
हाड़ा की नियुक्ति एक व्यक्ति के रूप में एक बेहतर निर्णय के रूप में मानी जा रही है, मगर उनकी छवि एक जुझारू नेता की नहीं है, जिसकी कि विपक्ष में बैठी भाजपा को जरूरत है। वे एक प्राइवेट डॉक्टर हैं। यही उनकी आजीविका का साधन है। ऐसे में वे विपक्ष में रूप में आए दिन विरोध प्रदर्शन आदि के लिए पूरा समय निकाल पाएंगे, इसमें तनिक संदेह है। हां, इतना जरूर है कि वे तीसरे विकल्प के रूप में सामने आए हैं, इस कारण देवनानी व भदेल के दो गुटों में बंटी पार्टी में वे संतुलन बैठा सकते हैं।
ताजा हालात में कुछ लोग उन्हें अनिता भदेल के नजदीक इसलिए मान रहे हैं, क्योंकि उन्होंने अनिता भदेल की पसंद आनंद सिंह राजावत के नाम का प्रस्तावक बनना मंजूर किया, मगर उन्हीं को अध्यक्ष बना दिए जाने से अनिता को नागवार गुजरा होगा।भदेल के लिए यह नियुक्ति कुछ तकलीफदेह हो सकती है, क्योंकि अब तक भाजपा में कोली समाज में एक मात्र बड़ी नेता हैं, अब एक और नेता पावर सेंटर बन जाएगा। ज्ञातव्य है कि जब हाड़ा मेयर का चुनाव हारे थे, तब यही परसेप्शन बना था कि उनकी अरुचि के कारण ही हाड़ा हारे हैं। ऐसा इसलिए कि कोई भी नेता अपनी ही जाति में किसी और को आगे बढ़ता हुआ देखना पसंद नहीं कर सकता।
कुछ लोगों का मानना है कि अनिता की तुलना में देवनानी को ज्यादा बड़ा झटका लगा है। यह माना जा रहा था कि वे सोनी को नियुक्त करवाने के लिए एडी चोटी का जोर लगाए हुए थे। येन-केन-प्रकारेन सोनी के ही अध्यक्ष बनने की संभावना जताई जा रही थी। खुद सोनी भी आश्वस्त थे।
हाड़ा के अध्यक्ष बनने से पार्षद जे. के. शर्मा को भी झटका लगा है। सोनी व राजावत की लड़ाई में उनका नंबर आता दिख रहा था। एक पार्षद के रूप में उन्होंने साफ सुथरी छवि बना रखी है। वे मेयर पद के भी दावेदार रहे हैं। सबसे बड़ी बात ये कि उन पर भाजपा के दिग्गज राष्ट्रीय नेता भूपेन्द्र सिंह यादव का हाथ है, फिर भी उनको चांस नहीं मिल पाया।
हाड़ा के शहर अध्यक्ष बनने का एक साइड इफैक्ट ये है कि अब उनकी पत्नी की मेयर पद की संभावित दावेदारी कमजोर हो जाएगी। चूंकि शहर अध्यक्ष कोली व विधायक भी कोली जाति से है, ऐसे में भाजपा हाईकमान पर ये दबाव रहेगा कि वे किसी और अनुसूचित जाति की महिला पर दाव खेले। ऐसे में जिला प्रमुख श्रीमती वंदना नोगिया उभर कर आ सकती हैं। नए समीकरण से पहले भी उनकी दावेदारी मजबूत मानी जाती रही है। हालांकि पूर्व सभापति श्रीमती सरोज जाटव भी दावेदार हैं, मगर अपेक्षाकृत कमजोर। उनके अतिरिक्त पूर्व राज्य मंत्री श्रीकिशन सोनगरा के परिवार की किसी महिला की दावेदारी मानी जा रही है।
स्वयं हाड़ा के लिए उनकी नियुक्ति राजनीति का एक सुखद मोड़ है। एक तरह से उनका यह राजनीतिक नवोदय है। मेयर के चुनाव हारने के बाद भले ही वे शहर महामंत्री बने, मगर पहली पंक्ति के नेताओं में उनकी गिनती नहीं थी। उनका नाम अध्यक्ष पद की दावेदारी में कहीं भी नहीं था। वे तो अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरने गए आनंद सिंह राजावत के प्रस्तावक थे। एक प्रस्तावक को ही अध्यक्ष बना दिया जाना वाकई चौंकाने वाला है।
कुछ जानकारों का मानना है कि हाड़ा की नियुक्ति अनुसूचित जाति वर्ग को खुश करने के लिए की गई है, ताकि उसका लाभ मेयर के चुनाव में मिले।
राजनीति की बारीक समझ रखने वाले मानते हैं कि आज भले ही श्रीमती भदेल अपने आप को मेयर चुनाव से अलग कर रही हैं, मगर आखिर में वे ही पहले नंबर पर होंगी। उनके मुकाबले दूसरा बेहतर प्रत्याशी भाजपा के पास है भी नहीं। साधन-संपन्नता व कार्यकर्ताओं के नेटवर्क के हिसाब से। वे जानती हैं कि एक विपक्षी विधायक की तुलना में मेयर बनना ज्यादा अच्छा है। देखते हैं आगे-आगे होता है क्या?
-तेजवानी गिरधर
77420670
tejwanig@gmail.com

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