
इन सब के बीच हर एक के मन में एक ही सवाल है। कफ्र्यू के बाद भी कैसे फैला कोरोना? चूक कहां हुई? हालांकि ताजा जो हालत हैं, उसे देखते हुए यह सवाल अब बेमानी सा लगता है। मुर्दे उखाडऩे सा प्रतीत होता है। अव्वल तो पता नहीं लगेगा कि फैला कैसे? गत पता लग भी गया तो आप क्या कर लोगे? कोई एक आदमी तो जिम्मेदार होगा नहीं, जिसे फांसी पर चढ़ा दोगे। लापरवाही कई स्तर पर हुई है। सरकारी एजेंसियों के स्तर पर भी, जिनका पोस्टमार्टम अखबार वाले कर ही रहे हैं। आम जनता के स्तर पर भी, जो डंडे खा कर भी बाहर निकलने से बाज नहीं आ रही थी। डंडे भी ऐसे खाये कि वर्षों तक याद रहेंगे। गनीमत रही कि आरएसी के नहीं थे। उनका मजा भी हम कई साल पहले चख चुके हैं।
कुछ लोग मानते हैं कि पुलिस ने बहुत ज्यादती की, मगर अनेक का मानना है कि अगर सख्ती न बरती होती तो, हालात कुछ और होते। यह मत भी सामने आया है कि सख्ती मुख्य चौराहों व रास्तों पर तो थी, मगर दरगाह के आसपास की तंग गलियों में आवाजाही बनी रही। मॉनिटरिंग की कमी सामने आई है, मगर आबादी का धनत्व बहुत अधिक होने के कारण भी संक्रमण को रोकना बेहद मुश्किल था। इसमें जिला प्रशासन कर भी क्या सकता था? पब्लिक भी क्या कर सकती थी? वैसे ठीक से सर्वे न होने की शिकायतें भी सामने आई हैं। इसलिए बीमारी दबी पड़ी रही। वह अब फूट कर निकल रही है। भोजन के पैकेट या खाद्य सामग्री के वितरण के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग की पालना भी ठीक से नहीं हुई। पासों का जम कर दुरुपयोग हुआ। आखिरकार कलेक्टर को सेल्फी व फोटो खींचने पर रोक लगानी पड़ी। सोशल डिस्टेंसिंग का सबसे ज्यादा भट्टा सब्जी मंडियों में बैठा। हालात ये हो गई कि मंडी दो-दो दिन के लिए बंद करनी पड़ी, नतीजन लोगों को दुगुनी रेट पर सब्जी खरीदनी पड़ी। शेल्टर्स होम्स पर नियंत्रण की कमी ने भी समस्या उत्पन्न की।
हर एंगल से सोचा जाए तो यही लगता है कि अकेला कफ्र्यू लगाना और पुलिस का सख्त होना ही पर्याप्त नहीं था। अजमेर का रेड जोन में आना सामूहिक जिम्मेदारी है। अब वापस दुरुस्त होना भी सबका दायित्व है। बेशक लॉक डाउन की अपनी समस्याएं हैं, मगर कुछ दिन और सब्र रख कर अपना बचाव रखना होगा। उसके अलावा कोई चारा भी तो नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
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