गुरु-शिष्य परंपरा ही विकसित भारत की आधारशिला, विश्वविद्यालयों को राष्ट्रनिर्माता युवा तैयार करने होंगे : कुलगुरु

एनईपी-2020 के अनुरूप समग्र शिक्षा, संवैधानिक कर्तव्यों, पर्यावरण संरक्षण और नशामुक्त भारत का दिया संदेश

अजमेर।

उच्च शिक्षा संस्थानों का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए चरित्रवान, जिम्मेदार और नवाचारी नागरिक तैयार करना होना चाहिए। भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (एनईपी-2020) तथा विकसित भारत-2047 के संकल्प को जोड़ते हुए यह विचार महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर एवं अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (एबीआरएसएम) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘गुरु वंदन एवं नवागंतुक विद्यार्थी स्वागत समारोह’ में व्यक्त किए गए। कार्यक्रम में शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण, संवैधानिक दायित्वों, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने पर विशेष बल दिया गया।

मुख्य वक्ता एवं एबीआरएसएम के क्षेत्रीय सह-प्रमुख योगेंद्र जी ने कहा कि भारत की गुरु-शिष्य परंपरा केवल ज्ञान देने की व्यवस्था नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्र निर्माण का आधार रही है। उन्होंने कहा कि आज के युवा अपने मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक हैं, लेकिन विकसित भारत के निर्माण के लिए उन्हें अपने मौलिक कर्तव्यों का भी समान रूप से पालन करना होगा। उन्होंने विद्यार्थियों से राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ अनुशासित, उत्तरदायी एवं सामाजिक जीवन जीने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि भारत विश्व का सबसे युवा देश है और यही युवा वर्ग वर्ष 2047 तक विकसित भारत की दिशा तय करेगा। इसलिए विश्वविद्यालयों को ऐसी शिक्षा देनी होगी, जो विद्यार्थियों में ज्ञान के साथ संस्कार, नेतृत्व क्षमता, सामाजिक संवेदनशीलता और राष्ट्रीय चेतना का विकास करे। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, नशामुक्त समाज, भारतीय जीवन मूल्यों तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को भी राष्ट्रनिर्माण का अभिन्न अंग बताया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि भारतीय शिक्षा परंपरा में गुरु केवल विषय विशेषज्ञ नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक होता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय गुरुकुल परंपरा की उसी समग्र शिक्षा की अवधारणा को पुनः स्थापित कर रही है, जिसमें बौद्धिक, शारीरिक और नैतिक विकास को समान महत्व दिया गया है।

कुलगुरु ने कहा कि विकसित भारत के निर्माण में विश्वविद्यालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उच्च शिक्षा संस्थानों को ऐसे विद्यार्थी तैयार करने होंगे जो अनुसंधान, नवाचार, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय विकास में सक्रिय योगदान दे सकें। उन्होंने शिक्षकों का आह्वान किया कि वे आत्ममंथन करते हुए विद्यार्थियों के जीवन में प्रेरणास्रोत बनें तथा शिक्षा को रोजगार के साथ-साथ चरित्र निर्माण का माध्यम भी बनाएं। कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय की अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ इकाई ने किया

अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के प्रदेश उपाध्यक्ष प्रो सुभाष चन्द्र ने बताया कि कार्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा, अनुशासन, नागरिक दायित्व, पर्यावरण संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त जीवन शैली, जल संरक्षण तथा नशामुक्त भारत जैसे विषयों को भी उच्च शिक्षा की प्राथमिकताओं से जोड़ते हुए विद्यार्थियों से इन मूल्यों को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया गया। कार्यक्रम मे विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी एवं बड़ी संख्या मे छात्र उपस्थित थे |

मुख्य बातें

  • विकसित भारत-2047 के लिए चरित्रवान और उत्तरदायी युवाओं के निर्माण पर जोर।
  • एनईपी-2020 को भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति बताया।
  • विद्यार्थियों से मौलिक अधिकारों के साथ मौलिक कर्तव्यों के पालन का आह्वान।
  • पर्यावरण संरक्षण, नशामुक्त भारत और सामाजिक उत्तरदायित्व को शिक्षा से जोड़ने पर बल।
  • विश्वविद्यालयों से अनुसंधान, नवाचार और राष्ट्र निर्माण के केंद्र बनने का आह्वान।

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