-मेरे द्वारा ’’जनता ऊपर, आसमां नीचे’’ शीर्षक से लिखे ब्लॉग पर अजमेर के ही मेरे वरिष्ठ साथी पत्रकार विक्रम सिंह चौधरी ने अपनी राय जाहिर की
-भाई चौधरी ने अपनी राय में यह बताया है कि आखिर बहुसंख्यक मतदाता वोट डालने के लिए क्यों नहीं निकला
-मध्यमवर्गीय लोग किस तरह व्यवस्थाओं में पिस रहे हैं, इसका खुलासा भी भाई चौधरी ने किया है

भाई विक्रम सिंह चौधरी की कलम से–
लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जो हालत हुई है, उसके पीछे वैसे तो कई सारे मुख्य कारण हैं। विदूषक, विद्वान एवं विश्लेषक कई प्रकार के तर्क दे रहे हैं। आईना भी दिखा रहे हैं। साथ ही कह रहे हैं कि बहुसंख्यक मतदाता मतदान करने के लिए निकले ही नहीं। अब वह क्यों नहीं निकले, इस पर किसी का ध्यान जा ही नहीं रहा। कहने में बातें छोटी-छोटी लगेंगी, लेकिन इन मतदाताओं की जो पीड़ा है, वह ना तो कोई देख रहा है, ना देखना चाहता है। सबसे पहली बात बहुसंख्यक मतदाताओं में सबसे बड़ा वर्ग मध्यम वर्ग है, जो आज की जरूरत के हिसाब से अपने परिवार के लिए बड़ी मुश्किल से चारपहिया या दुपहिया वाहन यानी कार, स्कूटी, बाइक खरीद पाता है और भाजपा सरकार 10 साल की उम्र होने पर इस कार को और 15 साल होने पर स्कूटी या बाइक को कंडम यानी कबाड़ करार दे देती हैl इस कबाड़ को यदि 5 साल और सड़क पर चलाना है तो अवधि विस्तार शुल्क के लिए मोटी रकम जमा करानी होती है जो कि कई लोगों ने अब तक जमा करवायी भी है। दूसरी बात वाहन कोई-सा भी हो, उस पर हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट लगवाना जरूरी है, नहीं तो भारी-भरकम चालान कटेगा। अब इस हाई सिक्योरिटी प्लेट का क्या मतलब है? क्या यह प्लेट लगाने के बाद उन वाहनों के साथ एक पुलिस वाला साथ चलेगा या कोई सिक्योरिटी गार्ड रखा जाएगा। ऐसा तो नहीं है ना। तो फिर जनता की नाराजगी वाजिब है कि अपनी मर्जी के नियम-कायदों से डरा-धमकाकर उनसे बेवजह रकम छीनने की व्यवस्था बना दी गई है। रकम जमा कराने के बाद भी ऊपर से 15 साल बाद उन्हें अपनी गाड़ी भी कबाड़ में कटवानी पड़ेगी, जबकि निजी कारों का वर्षों तक कुछ नहीं बिगड़ता। वाहनों के मालिक अपने निजी वाहनों को बिल्कुल ठीक हालत में रखते हैं। बाकायदा उनका रखरखाव करवाते हैं, तो फिर वह कबाड़ कैसे हो सकती है। जब उनके वाहनों को परिवहन विभाग ने कबाड़ घोषित कर दिया, तो जनता ने भी ऐसे कबाड़, बेतुके दिमाग वाली सरकार को भी कबाड़ की तरह ही लिया और इसीलिए वोट डालने के लिए नहीं निकले। मतदान करें भी तो कैसे करें। अभी तो पर्यावरण के नाम पर वाहन छीनने का कानून बनाया है। बाद में न जाने और क्या-क्या छीन लिया जाए। जबकि वाहनों की फिटनेस जांच का प्रावधान होना चाहिए, लेकिन सरकार बनते ही जनप्रतिधि पहले चौकीदार और फिर सीधे भगवान के अवतार ही बन बैठे। इसलिए ऐसे जनप्रतिनिधियों से तो दूरी ही भली। फिर वाहनों का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस बढ़ाकर तिगुना पहले ही कर दिया गया था। जिसे लोगों ने देश के विकास के नाम पर बर्दाश्त भी कर लिया था। हालांकि यह जनता पर अलग से आर्थिक भार है। इसके अलावा सड़कों पर चलने के लिए टोल टैक्स कम करने की बजाय और बढ़ा दिया गया। रेलगाड़ियों में सफर करने के लिए गरीबों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया गया। अधिकांश रेलगाड़ियों में एयरकंडीशन कोच होते हैं, जबकि सामान्य श्रेणी के कोच दो या तीन ही होते हैं। एसी कोच बनाकर न जाने कौन-सा और किसके लिए विकास किया गया। यह लोगों को अब तक समझ में नहीं आ रहा। टिकट लेने से पहले रूह कांपने लगती है। जनरल बोगी में ठुंसें तो आखिर कितने लोग ठुंसें। मध्यमवर्गीय और गरीब लोगों को सीमित कोचों में जानवरों की तरह ठुंस कर सफर करना पड़ता है। गरीब लोगों को उज्जवला गैस कनेक्शन देने के नाम पर ठग लिया गया। सिलेंडर तो दिया गया, लेकिन उसे फिर भरा नहीं गया यानी जो लोग चूल्हे पर लकड़ियों से खाना पका रहे थे, वह फिर से लकड़ियों पर ही खाना पकाने की स्थिति में आ गए। ऐसी और भी कई बातें हैं, जिससे मध्यमवर्गीय मतदाता खासा नाराज है और वह नाराजगी उसने दिखा भी दी है। और तो और जिन भगवान श्रीराम के नाम पर मतदाताओं को भावुक करके उनके वोट झटकने की राजनीति खेली जा रही थी, उसे शायद भगवान श्रीराम ने ही फेल कर दिया। भगवान श्रीराम का मंदिर क्या बनाया, सत्ताधीश तो खुद को ही भगवान समझने लग गए। अब जहां लोगों को वास्तविक भगवान और उनके चरित्र की भली-भांति जानकारी है, वह अहंकार से भरे स्वयंभू भगवान को स्वीकार करें तो करें कैसे, एक नाराजगी यह भी है। इसलिए इस तरह के फैसले लेने वाले अब इस तरफ भी गौर करें कि बेरोजगारों को नौकरियां देने की बजाय उन्होंने जो निजीकरण किया है और युवाओं को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर किया है, वह बेरोजगार युवा आखिर ऐसे जनप्रतिनिधियों को वोट दें तो क्यों दें। जो उन्हें अच्छा पढ़ा-लिखा होने के बावजूद भी सड़क पर ठेला लगाकर पकोड़े बनाने की सलाह दें। इसलिए ऐसे युवाओं ने भी लोकसभा चुनाव में इस सलाह को भी पकोड़े वाली कढ़ाई में ही तल के रख दिया। यह तो रही मध्यमवर्गीय मतदाताओं और युवाओं की नाराजगियां। नाराजगी की एक और भी वजह है और वह यह है कि दूसरे खेमों को छोड़-छोड़ कर भाजपा के तंबू में आ घुसे नेताओं को जनता के ऊपर जबरन थोप दिया गया, जिनके इतिहास और वर्तमान को जनता पहले से ही जानती थी। अब जिनके बारे में पहले से ही जानकारी हो, उन्हें आखिर वोट देने के लिए अपना समय कौन खराब करेगा। इसलिए इस बार के चुनाव नतीजे से सरकार बनाने की तमन्ना रखने वाली पार्टी को न केवल सीख लेनी चाहिए, बल्कि इस तरह के लिए गए ऊटपटांग फैसलों पर पुनर्विचार भी करना चाहिए और देश के मध्यमवर्ग तथा युवाओं के भविष्य के लिए कुछ बोलने या नियम-कायदे बनाने से पहले हजार बार सोचना चाहिए और उनकी राय भी लेनी चाहिए, क्योंकि देश का भविष्य इन्हीं युवाओं के हाथ में है। इसीलिए अब सत्ता के मद में चूर होकर अविवेकपूर्ण फैसले लेने वालों को मतदाताओं के विवेकपूर्ण फैसले ने पसीने ला दिए हैं।
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✍️प्रेम आनन्दकर, अजमेर।
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