*भाजपा को नसीहत, कांग्रेस को हिदायत*

-भाजपानीत एनडीए को अपाहिज कर बैसाखियां थमा दी हैं, तो कांग्रेसनीत इंडिया को बिना बैसाखी के आधा-अधूरा छोड़ दिया
-मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्रियों ने खुलकर बैटिंग की, तो दोनों राज्यों में भाजपा फायदे में रही
-राजस्थान में तीन माह तक लचीली सरकार चलने से भाजपा को कितना नुकसान उठाना पड़ा, जगजाहिर है

✍️प्रेम आनन्दकर, अजमेर।
📱08302612247

👉लोकसभा चुनाव के नतीजों ने इस देश और प्रदेश की कई कहानियां बयां कर दी हैं। भाजपा को सबक सीखने की नसीहत दी है, तो कांग्रेस को भी घमंड में चूर नहीं होने की हिदायत दी है। कांग्रेस घमंड में चूर हुई थी, तो पिछले विधानसभा चुनाव में जनता ने अच्छा-खासा सबक भी सिखाकर सत्ता से बाहर कर दिया। देश और प्रदेश के मतदाता क्या चाहते हैं, किस दल को पसंद करते हैं, किसे नहीं, यह समझना और मतदाताओं का मूड भांपना बहुत ही टेढ़ा काम है। अब देखो, पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विधानसभा चुनाव के आखिरी महीनों में दिल खोलकर दोनों हाथों से जनता को सरकारी खजाना लुटाया, फिर भी जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया। मतदाता या तो दिल खोलकर भाजपानीत एनडीए पर वोट लुटाते या फिर कांग्रेसनीत इंडिया गठबंधन को पूर्ण बहुमत देते। भाजपा और एनडीए को अपाहिज कर बैसाखियां थमा दी हैं, तो कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को बिना बैसाखी के सहारे आधा-अधूरा छोड़ दिया है। बैसाखियों पर अब भाजपानीत एनडीए सरकार किस गति से चल पाएगी, यह आने वाले समय में ही पता चलेगा, लेकिन भाजपा को अब पूरी तरह सचेत हो जाना चाहिए। राजस्थान में भाजपा का ’’मिशन-25’’ सफल नहीं होने के पीछे जो कुछ बड़े कारण मेरे एनालिसिस में सामने आए हैं, उनका जिक्र यहां कर रहा हूं। अव्वल तो नवंबर-2023 में हुए विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सौंपी थी, लेकिन भाजपा ने मुख्यमंत्री का चयन करने में ही 15 दिन लगा दिए, जबकि यह निर्णय चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद अगले दो-तीन दिन में ही विधायक दल की बैठक बुलाकर कर लिया जाना चाहिए था। जब पहले ही यह तय था कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को हाशिए पर रखने के साथ सत्ता से बाहर रखना है, तो फिर आलाकमान किस उधेड़बुन में लगा रहा। जबकि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी राजस्थान जैसी ही राजनीतिक स्थिति होने के बावजूद वहां जल्दी से मुख्यमंत्री चुन लिए गए थे। राजस्थान में मुख्यमंत्री चयन का फैसला लेने में ही देरी और फिर उसके बाद मंत्रिमंडल के गठन में भी इतने ही दिनों का विलंब होने से जनता को यह समझते देर नहीं लगी कि नई सरकार में कितना दम होगा और किस गति से चलेगी। जनता ने शायद यह भी मानस बना होगा कि अब भाजपा के साथ क्या किया जाना चाहिए। अंग्रेजी में एक कहावत है-’’फर्स्ट इम्प्रेशन इज दा लास्ट इम्प्रेशन।’’ कुछ ऐसा ही असर राजस्थान की जनता और अफसरशाही पर पड़ा। बात यहीं खत्म नहीं हुई। लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने तक राजस्थान की भाजपा सरकार को धुआंधार बैटिंग करने के लिए तीन महीने मिले थे, लेकिन सरकार के लचीले रूख से भी जनता और अफसरशाही को यह समझते देर नहीं लगी कि यह सरकार कैसी चलेगी? ना प्रशासनिक ढांचे के नट-बोल्ट ढंग से कसे गए और ना ही जनता को राहत देने वाले निर्णय तेजी से और ठोस तरीके से किए गए। कहीं-ना-कहीं राजस्थान में जनहित से जुड़े मसलों पर निर्णय लेने के लिए दिल्ली के आदेशों पर निर्भर रहना पड़ा। यही कारण है कि विपक्षी दल कांग्रेस ने भजनलाल सरकार को ’’पर्ची वाली सरकार’’ कहना शुरू कर दिया था।

प्रेम आनंदकर
वैसे यह बात कहते हुए खुद कांग्रेस नेताओं को भी अच्छी तरह सोच लेना चाहिए कि उनकी पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार और उसके मुखिया अशोक गहलोत भी दिल्ली के दस जनपथ से मिलने वाले आदेशों और इशारों पर ही निर्भर रहते थे। राजस्थान भाजपा के लोगों, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहनलाल यादव और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के तीन महीने के कामकाज को देख लीजिए। इन दोनों मुख्यमंत्रियों ने खुलकर बैटिंग की और अनेक अफसरों को नाप दिया। यही कारण है कि मध्यप्रदेश में सभी 29 सीटों पर भाजपा और छत्तीसगढ़ में 11 में से 10 सीटों पर भाजपा ने अपना परचम लहराया है। जबकि राजस्थान में सभी 25 सीटें जीतने का सपना देखने वाली भाजपा को मात्र 14 सीटें ही मिल पाईं। भाजपा आलाकमान जी, सुन लीजिए। अफसरशाही के भरोसे कोई भी सरकारें सफलता के साथ नहीं चला करती हैं। अफसर और कर्मचारी लोकसेवक होते हैं। योजनाएं मुख्यमंत्री और मंत्रियों से बनवाइए, अफसरशाही से उन पर अमल कराइए। अफसरशाही के भरोसे रहेंगे, तो अभी आधी लुटिया डूबी है, आगे चलकर पूरी डूब जाएगी। यकीन नहीं हो तो राजस्थान में ही कांग्रेस को देख लीजिए। अफसरशाही के हावी रहने और कांग्रेस सरकार द्वारा जनता व अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं की बजाय अफसरशाही पर भरोसा करने के कारण की उसकी क्या स्थिति हुई है। मुख्यमंत्री जी, जिस भी अफसर के खिलाफ जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं से विपरीत फीडबैक मिले, उसे तुरंत हटाकर अन्यत्र लगाने में देर मत कीजिए। जिस तरह अफसरों के कहे-कहे कांग्रेस की सरकार कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए जनता को सर्दी, गर्मी, बरसात में धक्के खिलवाती रही, लाइन में लगवाती रही, उस तरह आप मत कीजिए। जब खाद्य सुरक्षा, विधवा, वृद्धावस्था, परित्यक्ता पेंशन सहित अन्य योजनाओं का सारा रिकॉर्ड सरकार के पास है, तो योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए तंबू तानकर कैंप लगाने और जनता को परेशान करने की क्या जरूरत है। हां, यदि कहीं ऐसा लगता है कि कुछ योजनाओं में गड़बड़ियां हो रही हैं या वास्तविक लोगों की बजाय संपन्न लोगों को लाभ मिल रहा है, तो उसका आप सरकारी कर्मचारियों की बजाय स्वतंत्र, निष्पक्ष और ईमानदार एजेंसी के माध्यम से सर्वे कराकर ऐसे लोगों को बाहर निकाल सकते हैं। भाजपा आलाकमान और मुख्यमंत्री जी, जनता ने आपका तीन माह का कार्यकाल देख लिया है। इसीलिए जनता ने आपकी उम्मीदों के विपरीत वोटों की इबारत लिखी है। आप चाहते हैं कि अगले पांच साल बाद वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव और वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव में देश-प्रदेश में फिर से भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आए, तो अभी से जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं की सुनिए, उन्हें तवज्जो दीजिए, केवल और केवल जनता को सर्वोपरि मानकर उनके हित में निर्णय कीजिए, जनता की शिकायतों पर त्वरित गौर कर उनका समाधान कीजिए। राजस्थान में कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने से एक बात तो अच्छी तरह समझ में आ गई और समझ आ जानी चाहिए कि चुनाव नजदीक देखकर आखिरी कुछ महीनों में सरकारी खजाना लुटाने से कुछ नहीं होता है। सरकारी खजाना क्यों लुटाया जाता है, इसे भी जनता अच्छी तरह जानती और समझती है। जनता को नई सरकार बनने के साथ ही महंगाई से राहत, पानी-बिजली के संकट से निजात, बेहतर कानून-व्यवस्था, पारदर्शी शासन-प्रशासन, भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोरी, कमीशनखोरी से निजात, पुलिस थानों में फरियादियों के साथ न्याय, सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का बिना परेशानी के लाभ चाहिए। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जनता को सर्वोपरि मानकर केवल और केवल जनता की सुनी, इसीलिए लगातार तीन बार उन्होंने सरकार चलाई और चौथी बार भी भाजपा की सरकार बनवाई। यही वो जनता है, जो राजा को रंक और रंक को राजा बनाने की ताकत रखती है।
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