महाराष्ट्र में भाजपा का भदेस

maha_bjp_leaders_956219456-प्रेम शुक्ल– महाराष्ट्र में मतदान संपन्न हो गए। तमाम उम्मीदवारों की किस्मत इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में बंद हो चुकी है। अब 19 अक्टूबर की दोपहर में ही महाराष्ट्र के राजनीतिक भविष्य की तस्वीर साफ होगी। इस चुनाव में पहली बार राज्य के चारों बड़े दल अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी। चारों तरफ बीजेपी के जीत का शोर भी प्रसारित किया जा चुका है, हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि यदि सचमुच भाजपा को सत्ता- स्थापना का अवसर मिला तो मुख्यमंत्री कौन होगा?

मोदी के करीबी के रूप में भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष देवेंद्र फडणवीस को देखा जाता है। राष्ट्रीय अध्यक्ष पद का प्रभार संभालने के बाद अमित शाह जब से देवेंद्र फडणवीस के घर गए तभी से भाजपा में उनका व्यक्तिगत सेंसेक्स उछाल मार रहा है। प्रशासनिक अनुभव के मामले में नितिन गडकरी भाजपा के उपलब्ध नेताओं में सबसे आगे हैं। नितिन गडकरी जब राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे तब उनकी ओर भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखा जाता था। ऐसा भी समय था जब गडकरी ने अपने पुराने साथी संजय जोशी के लिए गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से पंगा किया था। यदि 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में गडकरी-जोशी की जोड़ी को सफलता मिली होती तो शायद यही जोड़ी मोदी के राष्ट्रीय उदय में सबसे बड़ी बाधा बनती।

टीम मोदी के रणनीतिकार 2012 के यूपी चुनावों के परिणामों तक चुप रहे। जब यूपी में भाजपा विधानसभा चुनावों में 50 का आंकड़ा भी नहीं छू पाई तो गांधीनगर का दबदबा बढ़ गया। अपना प्रभाव साबित करने के लिए टीम नमो ने सबसे पहले मुंबई में आयोजित भाजपा की कार्यकारिणी का समय चुना। उन दिनों जब कोई नितिन गडकरी से भाजपा के भावी प्रधानमंत्री प्रत्याशी का नाम पूछता था तब गडकरी लगभग 10 नामों को गिना देते थे। जमीनी हकीकत अलग थी। हर कोई जानता था कि गडकरी के 10 नामों में मोदी के सिवा एक भी नाम ऐसा नहीं था जिसके नाम पर भाजपा कैडर और समर्थकों में उत्साह का संचार कराया जा सके। गडकरी ने कार्यकारिणी की सभा के बाद जनसभा को संबोधित करने के लिए मुख्य वक्ता के तौर पर नरेंद्र मोदी के पोस्टर्स लगवा दिए। इन पोस्टर्स के चिपकने के कुछ देर बाद ही मीडिया में खबर लीक हुई कि नरेंद्र मोदी मुंबई तब तक नहीं आएंगे जब तक संजय जोशी को कार्यकारिणी से बाहर का रास्ता नहीं दिखाया जाता। कुछ घंटों तक तो गडकरी अपनी बात पर अड़े रहे, पर जब उन्होंने पाया कि संजय जोशी के समर्थन में भाजपा में कोई स्वर नहीं उभर रहा है तो उन्होंने हथियार डाल दिए। गडकरी का पानी टीम मोदी ने नाप लिया। इसके पहले भाजपा के दिल्ली दरबार में गडकरी का वजन था। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत के बेहद करीबी माने जाते थे। प्रचार था कि मोहनराव ने गडकरी को भाजपा के दिल्ली स्थित डी-४ को खत्म करने के लिए भेजा था। भाजपा में तब आडवाणी के 4 करीबियों को डी-4 की संज्ञा प्राप्त थी। ये डी-4 थे अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैंया नायडू और अनंत कुमार। इन चारों को लालकृष्ण आडवाणी संरक्षित चौकड़ी कहा जाता था। हालांकि तब भी अरुण जेटली को दिल्ली में नरेंद्र मोदी के मित्र के रूप में जाना जाता था। इसी डी-४ ने जिन्नाकांड के बाद अध्यक्ष पद पर जब आडवाणी की बजाय राजनाथ सिंह को लाया गया तो उन्हें निकम्मा साबित कर दिया था। गडकरी दिल्ली पहुंचे और पहले ही मोर्चे में दिल्ली की गर्मी न बर्दाश्त कर सकने के चलते गश खा गए। तब उनके खिलाफ मीडिया अभियान में भी डी-4 का हाथ माना गया।

यह डी-4 भी खुल कर गडकरी से भिड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। उसे संघ शक्ति का भय था। जब संजय जोशी के मामले में गडकरी ने हथियार डाला और संघ का कमान चुप रहा तो संकेत बदल गए। उन्हीं दिनों अरविंद केजरीवाल ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वड्रा पर भूखंड घोटाले के आरोप लगाए। इन आरोपों से केजरीवाल का सेंसेक्स आसमानी हुआ। केजरीवाल की एक सहयोगिनी अंजली दमानिया ने उन्हीं दिनों गडकरी की पूर्ति समूह से जुड़े कुछ भ्रष्टाचार के आरोप उछाले। गडकरी इस मुद्दे की सफाई दे पाते उसके पहले ही उनकी जीभ फिसलने के चलते एक गलती हुई। एक जनसभा में गडकरी ने स्वामी विवेकानंद और दाऊद इब्राहिम का आईक्यू लेवल एक तरह का बताया। मीडिया में यह बयान जबर्दस्त उछला। जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और राम जेठमलानी इस बयान के चलते गडकरी पर पिल पड़े। महेश जेठमलानी ने तो भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति से इस्तीफा तक दे डाला। संघ गडकरी को अध्यक्ष पद का दूसरा कार्यकाल देना चाहता था। इसी इरादे से भाजपा के संविधान में संशोधन भी कराया गया था। इस संविधान संशोधन के चलते गडकरीवादी गफलत में रह गए। तभी कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने मुंबई कांग्रेस के बागी अजीत सावंत को पुचकार कर एक गेम बजाया। अजीत सावंत के पास गडकरी के पूर्ति समूह के कॉरपारेट अनियमितताओं के कुछ दस्तावेज थे। ये दस्तावेज एनडीटीवी के श्रीनिवास जैन को सौंपे गए। कुछ दस्तावेज टाइम्स समूह को भी प्राप्त हुए थे। एनडीटीवी ने अपनी स्टोरी में गडकरी को रॉबर्ट वड्रा के समानांतर खड़ा कर दिया। स्वाभाविक तौर पर संघप्रमुख पर गडकरी के विकल्प को मान्यता देने के लिए दबाव बनने लगा। संघ गडकरी के समर्थन से हटता नजर नहीं आया। तब ‘टाइम्स’ समूह ने गडकरी के खिलाफ लगभग एक सप्ताह तक जबर्दस्त अभियान चलाया। सनद रहे कि अरुण जेटली ‘टाइम्स समूह’ के विधि सलाहकार होने के साथ-साथ प्रबंधन के बेहद करीबी रहे हैं। तब तक गडकरी मानते थे कि जेटली अध्यक्ष पद की दौड़ में उनके साथ हैं। अब जेटली का पैंतरा पलट चुका था। वह गडकरी को अध्यक्ष पद से हटाए जाने के पैरोकार हो गए थे।

टाइम्स समूह के पर्दाफाश के बाद भी संघप्रमुख गडकरी को अध्यक्ष पद पर नियुक्त करने के पक्ष में थे। तिथि भी करीब थी। अब आडवाणी अड़ गए। संघ के सर कार्यवाह भैयाजी जोशी को आडवाणी के पास भेजा जाना तय हुआ। जिस दिन मुंबई में आडवाणी और भैयाजी जोशी की मुलाकात होनी थी उस दिन सुबह ही आयकर टीम गडकरी के घर और पूर्ति समूह के कार्यालय जा पहुंची। मीडिया में खबर छा गई। स्वाभाविक तौर पर संघ ने चुनाव वर्ष में दुष्प्रचार से बचना तय किया। गडकरी हटा दिए गए और उनकी जगह राजनाथ सिंह अध्यक्ष पद पर आ गए। गडकरी समर्थक आज भी निजी वार्ता में इनकम टैक्स रेड के लिए जेटली-चिदंबरम मैत्री को दोष देते हैं। तब चिदंबरम वित्त मंत्री हुआ करते थे और उनकी जेटली से गहरी छनती थी। सच और झूठ को आंकना ऐसे मामलों में मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव हुआ करता है। जो गडकरी कल तक प्रधानमंत्री तय करने के तेवर दिखा रहे थे वही अब अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए संघर्ष करने लगे। राजनाथ सिंह ने अध्यक्ष बनते ही किस तरह नमो-नमो का जाप किया और आडवाणी समर्थकों को साफ किया  वह कथानक सर्वज्ञात है। गडकरी की हालत उस चौबे जैसी थी जो गया छब्बे बनने और दुबे बन कर लौट आया था। महाराष्ट्र की राजनीति में हाशिए पर पड़े गोपीनाथ मुंडे अब हताशा के दौर से बाहर आ चुके थे। गडकरी के अध्यक्ष काल में मुंडे इतने कुंठाग्रस्त थे कि वह कांग्रेस में शामिल होने जा रहे थे। तब शिवसेनाप्रमुख ने उन्हें भाजपा में रोके रखा। अब मुंडे को राजनाथ सिंह का साथ मिला। मुंडे ने गडकरी द्वारा महापौर-विधायक बनाए गए देवेंद्र फडणवीस का नाम अध्यक्ष पद के लिए आगे कर दिया। मुंडे सफल रहे। नागपुर में ही गडकरी की नागनथैया हो गई। आज जब कोई गडकरी से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की बात करता है तो वह ‘तौबा-तौबा’ करने लगते हैं। भाजपा प्रवक्ता एम.जे. अकबर संपादित समाचार पत्र ‘संडे गार्जियन’ की खबर को सच मानें तो गडकरी के बेडरूम तक की ‘बगिंग’ की गई। मुंडे के जीवनकाल में ही दिल्ली में नरेंद्र और महाराष्ट्र में देवेंद्र का नारा लगा। गडकरी के अनुसार मोदी तो मुंडे को मंत्रिमंडल में लेने को भी तैयार नहीं थे। भाजपा में अभी अनार यानी मुख्यमंत्री बनने लायक विधायक दल आया भी नहीं कि सौ बीमार खड़े हैं। भाजपा के भदेस को देखकर सिर्फ यही कह सकते हैं-

राजनीति का व्याकरण, कुर्सीवाला पाठ।
पढ़ा रहे हैं सब हमें, सोलह दूनी आठ।।
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