
तो सहूलियत केजरीवाल को भी मिलनी ही चाहिए। कायदे और फायदे सबको समान मिलने चाहिए। केजरीवाल को भी अभी कुछ ही माह ही हुए हैं cm बने, बल्कि राजनीती में ही नए हैं….
उन्हें फेल करने की कोशिश या फेल साबित करने के मन्सूबे गलत हैं।
मोदी जी के वादों और कामों के लिए अगर जनता से इंतज़ार करने की अपील है और मोदी जी को थोडा वक़्त देने की अपील है
तो केजरीवाल के लिए भी देश से यही अपील है कि उन्हें भी वक़्त दिया जाए और अच्छे/बुरे नतीजे का इंतज़ार किया जाए।
मोदी जी के लिए वक़्त और मोहलत मांगो और केजरीवाल से हथेली पे सरसों उगाने की उम्मीद करो… ये नैतिक आधार पर तो गलत है।
अब ये मत कहना के मैं आपिया हूँ। नहीं मैं आप पार्टी का समर्थक नहीं हूँ। हाँ व्यक्ति पूजा का समर्थक भी नहीं हूँ इसलिए निजी तौर पर किसी एक नेता का भक्त नहीं हूँ। मगर एक मुख्य पार्टी की विचारधारा का समर्थक हूँ। बावजूद इसके यहां केजरीवाल के पक्ष में इसलिए लिखा क्योंकि बात उसूलों की है, नियमों की है, कायदों की है, नैतिकता की है, समानता के अधिकार की है, प्रत्येक नागरिक व् नेता के नागरिक अधिकार की है।
एक ट्रेन की एक जैसी श्रेणी की बोगी में एक जैसा सफर करने वालों को सामान सुविधाएं मिलती हैं; और न्याय कहता है कि मिलनी भी चाहिए।
छह दशक से ज्यादा एक पार्टी और एक परिवार ने राज अगर किया तो लोकतंत्र में ये मौका उन्हें जनता ने ही दिया था। वो पार्टी या परिवार हिटलरशाही से देश पर काबिज नहीं हुआ था। अगर ऐसा लगता है कि उनकी सरकारें विफल थीं तो दोष लोकतंत्र में जनता का भी था। आखिर vote तो हम ही देते हैं।
जब उन्हें मौके मिले, फिर अब मोदी जी को बम्पर जीत मिली, तो केजरीवाल को उनसे भी बड़ी जीत मिली दिल्ली में। इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता।
वैसे वैचारिक, न्यायिक, तार्किक तथा नैतिक तौर पे केजरीवाल को समय और मौका दिए जाने से किसी को आपत्ति होनी भी नहीं चाहिए। क्योंकि हर पार्टी यही तो कहती है कि वो देश का भला चाहती है, तरक़्क़ी चाहती है, न्याय कायम करना चाहती है… तो क्या किसी की कोशिशों पे पानी फेर के न्याय कायम हो पायेगा…..??
इसी विरोधाभासी स्थिति की वजह से केजरीवाल के रूप में नए नेता का जन्म हुआ। यही हाल रहे तो आगे भी ऐसी कई पार्टियां और नए बागी नेता जन्म लेंगे। हालाँकि इस राजनीतिक तोड़फोड़ का इतिहास भी रहा ही है। शरद पंवार को राजनीती के जानकार भूले नहीं होंगे।
एक विख्यात समाजशास्त्री इमाइल दुर्खीम ने एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया था।
वाद+प्रतिवाद=संवाद
यानी वाद के रूप में एक विचार समाज में होता है। फिर उस विचार से असहमत कुछ लोग प्रतिवाद के रूप में उभरते हैं। इन वाद और प्रतिवाद के विवाद या समझौते से तीसरा विचार जन्म लेता है जो संवाद होता है। केजरीवाल वही संवाद हैं। हालांकि आगे जाके वो भी वाद का रूप लेंगे, फिर उनका कोई प्रतिवाद खड़ा होगा, और फिर विवाद या समझौते से एक नया विचार संवाद जन्म लेगा। ये एक निरंतर प्रक्रिया है जो हर समाज में चलती है।
लब्बोलुआब ये कि कोई अगर खुद को परखना चाह रहा है तो परखने दीजिये। अगर वो विफल हुआ तो आप स्वयंम ही सफल और सही साबित हो जाओगे। और अगर कहीं वो सफल हो गया तो ज़रुरत ये कि आप आत्ममंथन करें कि आप कहाँ गलत थे और वो कहाँ सही…!!!
——अमित टंडन