क्या फिर भी सुधरेगी नौकरशाही

-मुख्यमंत्री की फटकार का क्या अफसरों पर हो पाएगा असर
-निकम्मे अफसरों पर क्यों नहीं की जाती सीधी कार्यवाही

प्रेम आनंदकर
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 14 फरवरी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में अजमेर, कोटा, प्रतापगढ़ और हनुमानगढ़ के जिला कलेक्टरों के कामकाज पर नाराजगी जताते हुए सुधार करने की नसीहत दी। लेकिन असल सवाल यह उठता है कि गहलोत के इस कदम से शासन-प्रशासन में सुधार हो पाएगा। जिन कलेक्टरों का काम अपने जिले के अधीन उपखंड, तहसील, उपतहसील सहित सभी क्षेत्रों का नियमित दौरा करने, लोगों से मिलने, उनकी समस्याएं जानने, समस्याओं का तुरंत समाधान करने, सरकारी योजनाओं की मॉनिटरिंग करने, कहीं कोई खामी नजर आए तो उसे तुरंत दूर करने का होता है। लेकिन कलेक्टर खुद को नए जमाने के राजा-महाराजा से कम नहीं समझते हैं। जिन कलेक्टरों को आमजन के पास खुद जाना चाहिए, उनसे मिलने के लिए जनता उनके पास आती है। इसमें भी कलेक्टर जल्दी से नहीं मिलते और मिलते भी हैं तो चलाऊ जवाब देकर रवाना कर देते हैं। इसका ताजा उदाहरण वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में भी सामने आया, जब गहलोत ने कोटा के कलेक्टर से सम्पर्क पोर्टल पर बीपीएल परिवार की लंबे समय पेंडिंग अर्जी पढ़कर सुनाने को कहा। इससे जाहिर होता है कि कलेक्टरों को निचले तबकों के लोगों की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है। दरअसल कलेक्टर अमूमन तौर पर अपने चैम्बरों से बाहर ही नहीं निकलते हैं। उनका काम अपने निवास से दफ्तर और दफ्तर से निवास तक आना जाना है। केवल रात्रि चौपाल के लिए किसी गांव में एक दिन चले जाते हैं लेकिन वहां बमुश्किल ही रुकते हैं और खानापूर्ति कर लौट आते हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के बाद निचले अफसरों पर कार्यवाही करके इतिश्री कर दी गई, लेकिन जिन कलेक्टरों से मुख्यमंत्री खफा हुए, उन्हें केवल नसीहत देकर छोड़ दिया गया। यदि इनमें से एक के खिलाफ भी सख्त कार्यवाही की जाती तो शायद अन्य कलेक्टरों को सबक मिलता। बहरहाल, देखना यह है कि गहलोत के इस रुख से हुक्मरानों पर कोई असर होता है या नहीं।

-प्रेम आनन्दकर, अजमेर, राजस्थान।
15/02/2020, शनिवार।

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