ब्रह्म से जीव का मिलन ही महारास है- संत रामकिशोर

माया के आवरण से रहित शुद्ध जीव का ब्रह्म के साथ विलास ही रास है। गोपियों के वासना और अज्ञान के आवरण को हटाने के लिए श्रीकृष्ण ने महारास से पूर्व चीरहरण लीला की थी। चीरहरण लीला द्वारा श्रीकृष्ण ने गोपियों के वासना और अज्ञान रूपी वस्त्रों के आवरण को हटा दिया और गोपियों के साथ महारास किया। उक्त वाक्य पुरानी मंडी स्थित रामद्वारा में आयोजित चातुर्मासीय कथा के दौरान महाराज ने महारास की कथा का वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं से कहें। महाराज ने कहा कि जैसे पति के वियोग में छटपटाती पत्नी की भांति जब जीव ईश्वर के वियोग में छटपटाता है। तभी जीव को ईश्वर मिलते हैं।भगवान श्रीकृष्ण ने व्रज में जो वेणुवादन किया तो उसकी ध्वनि दिव्य लोकों में पहुंचकर वहां के देवताओं को भी स्तम्भित कर देती है किन्तु रासलीला की बांसुरी तो ईश्वर से मिलनातुर अधिकारी जीव गोपी को ही सुनाई देती है। बांसुरी की ध्वनि क्या थी यह भगवान का आह्वान था। जो अपनी समस्त इन्द्रियों के द्वारा केवल भक्तिरस का ही पान करे वही गोपी है। स्त्रीत्व तथा पुरुषत्व की विस्मृति होने के बाद ही गोपीभाव जागता है। शुद्ध गोपीभाव जागने के बाद ही रास की वंशी का स्वर कानों में सुनाई देने लगता है। इसी कारण वेणुनाद एवं रास की अधिकारिणी गोपियाँ ही हुईं। गोपियों ने अपना मन श्रीकृष्ण में मिला दिया था। अतरू भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया ने रासलीला के लिए गोपियों के दिव्य मन दिव्य स्थल की सृष्टि की। अगर रासलीला लौकिक श्रृंगार लीला होती को गोपियां सजधज कर जातीं परन्तु यहां तो भगवान का आह्वान सुनकर उन्हें जगत भूल गया। उन्होंने उल्टे.सीधे वस्त्र पहन लिए। उनका विचित्र श्रृंगार हो गया। गोविन्द ने उनके मन को हर लिया था। भगवान हैं बड़े लीलामय। उन्हीं की इच्छा से उन्हीं की वंशी के प्रेमाह्वान पर देह का भान भूली गोपियां जब भगवान के पास पहुंचती हैं । भगवान कृष्ण पूछते हैं गोपियो! व्रज में कोई विपत्ति तो नहीं आई घोर रात्रि में यहां आने का कारण क्या है मेरे पास क्यों आयी हो पतिसेवा और संतान सेवा करो व तुम्हें सुख मिलेगा। मैं सुख नहीं केवल आनन्द ही दे सकता हूँ। भगवान जीव को संसार में लौटाते हैं प्रलोभन देते हैं मायाजाल में फंसाते हैं। श्रीकृष्ण गोपियों को स्त्री धर्म समझाते हैं। गोपियां जानतीं थीं कि श्रीकृष्ण योगेश्वर अन्तर्यामी पूर्णब्रह्म हैं। गोपियां उसका उत्तर देती हैं। जब हमें साक्षात् परमात्मा मिल गए तो लौकिक पति से क्या लेना-देना। गोपियों ने अपने हृदय में जिस विशुद्ध प्रेमामृत को भर रखा थाए उस प्रेमामृत की चाह पूर्णकाम भगवान को हो गई। भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि गोपियों का प्रेम सच्चा है। ये शुद्ध भाव से मुझसे मिलने आईं हैं। अत: उन्होंने उन्हें अपना लिया। श्रीकृष्ण ने एक साथ अनेक रूप धारण किए। जितनी गोपियां थीं उतने स्वरूप बना लिए और प्रत्येक गोपी के साथ एक एक स्वरूप रखकर रासलीला आरम्भ की। हजारों जन्मों की तपस्या के फलस्वरूप विरही जीव आज ईश्वरमय हो गया। गोपियां श्रीकृष्णमय और भगवन्मय हो गयीं। सभी हाथों से हाथ मिलाकर नाचने लगे। रास में साहित्यए संगीत और कला नृत्य का समन्वय हुआ है।

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