अब भी नगर निगम की दुर्दशा क्यों?

भाजपा के पूर्व पार्षद जे के शर्मा ने नगर निगम के मौजूदा हालात पर तंज कसा है। उन्होंने कहा है कि कथित लिफाफेबाज पार्षद, कथित भ्रष्ट विधायक और सांसद छह माह से किसी की कोई दखलंदाजी नहीं, फिर भी ईमानदार अधिकारियों से नगर निगम क्यों नहीं चल पा रहा? कभी लगता था कि नेता ही कान के कच्चे होते हैं, लेकिन अब तो कुछ अधिकारी भी इसी श्रेणी में शामिल होते दिखाई दे रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि नेता पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन अपनी व्यवस्था की कमियों में झांकना शायद मुश्किल। कुछ लोग जनप्रतिनिधियों को लिफाफेबाज कह कर अपनी तथाकथित ईमानदारी और गरिमा साबित करने में लगे हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब निगम में किसी पार्षद की दखलंदाजी नहीं है, बोर्ड भी नहीं है और अधिकारी पूरी तरह स्वतंत्र होकर काम कर रहे हैं, तो फिर नगर निगम की यह दुर्दशा क्यों?
महज छह महीने में सफाई कर्मचारियों की चार-पांच बार हड़ताल, लगभग 70-72 कर्मचारियों के स्थानांतरण, सफाई व्यवस्था बदहाल, विकास कार्य लगभग ठप, अधिकारियों और कर्मचारियों की भारी कमी, और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां अनुभवहीन हाथों में। इतना सब होने के बाद भी नारा वही, मेरा अजमेर महान। व्यवस्था की हालत तो यह है कि कर्मचारियों की कमी और अनुभवहीन प्रशासनिक व्यवस्था के बीच लाखों रुपये के स्थानांतरण और यहां तक कि मृत कर्मचारियों के खातों में भुगतान जैसी गंभीर बातें सामने आ रही हैं। अगर यह सच है तो सवाल सिर्फ व्यवस्था पर नहीं, बल्कि जवाबदेही और निगरानी पर भी उठना चाहिए। जनप्रतिनिधियों को भ्रष्ट, चोर और लिफाफेबाज बता कर तालियां बटोरना बहुत आसान है, लेकिन मेरी उन महानुभावों से विनम्र सलाह है, दूसरों के गिरेबान में झांकने से पहले एक बार अपने गिरेबान में भी झांककर देखिए। क्योंकि ईमानदारी सिर्फ दूसरों पर आरोप लगाने का नाम नहीं है, ईमानदारी अपनी जिम्मेदारी निभाने और अपनी व्यवस्था की कमियों को स्वीकार करने का साहस भी है।
जनता सब देख रही है। कौन काम कर रहा है और कौन सिर्फ अपनी छवि चमका रहा है। जनता त्रस्त, अधिकारी मस्त और फिर भी दावा, मेरा अजमेर महान।

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