जन्नत के बहाने

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’
जन्नत१ के बहाने
क्यों दोज़ख़२ की तरफ़ ले जाते हो
ए जिहाद वालों
क्यों तुम मासूमो को बरगलाते हो
बताओ कौन से ख़ुदा ने कहा है
पाक है क़त्ल-ए-इंसाँ३
ख़ुदाई में वो अपनी
मोहब्बत करने को तुमसे कहता है
हूर की बात तुम करते हो
जो जन्नत में मिलेगी
पर क्यों छुपाते हो, दोज़ख़ भी न मिलेगा
इस ख़ूनी खेल के बाद
इशरत-ए-इंसाँ४ है
मोहब्बत में मिट जाना
फिर क्यों नफ़रत में जल के
औरों को जलाते हो
साजिशों में क्या रखा है
गुनाहों के अलावा
क्यों तुम इस कायनात में
गड़बड़ी फैलाते हो।
फ़राइज़५ तले गुज़ारिश है
तुमसे जिहाद वालों
छोड़कर राह-ए-कुफ़्र६
अमन से ज़िंदगी बिता लो

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’
मुंबई

शब्दार्थ:
१. जन्नत – स्वर्ग
२. दोज़ख़ – नर्क
३. क़त्ल-ए-इंसाँ – मनुष्य की हत्या
४. इशरत-ए-इंसाँ – मनुष्य का ऐश्वर्य
५. फ़राइज़ – कर्तव्य
६. राह-ए-कुफ़्र – दुराग्रह/पाप का रास्ता

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