उपानह प्रहार का हाईप्रोफाइल प्रचलन

डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
अस्त्र और शस्त्र में अन्तर को लेकर काफी अरसे से जानकारों द्वारा अपने-अपने तरीके से व्याख्यान दिये जाते रहे हैं। फागुन के महीने में जब लोग मस्ती के मूड में रहते हैं तब विश्लेषक अस्त्र और शस्त्र के उदाहरण के रूप में हर घर की रसोई में उपलब्ध बेलन का जिक्र किया करते हैं। गुझिया, पापड़, सामोसा एवं अन्य पकवान बनाने में इस्तेमाल किए जाने वाले मैदा व आंटे की लोइंयों को मनचाहा आकार देने के महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला और सामान्य दिनों में रोटियाँ बनाने वाला बेलन उस समय अस्त्र बनता है जब गृहणियों का पति कथित रूप उनकी बात नहीं मानता और घर से पलायन की जुगत में रहता है। उस समय क्रोध से आवेशित महिलाएँ बेलन जब बेलन खींचकर मारती हैं इस स्थिति में बेलन को अस्त्र कहा जाता है। दुर्भाग्यवश पति अपनी बिगड़ैल पत्नी की गिरफ्त में आ जाए और पत्नी बेलन हाथ में लेकर उसकी धुनाई करे ऐसी स्थिति में बेलन एक शस्त्र की तरह काम करता है। बेलन लगभग हर घर में मौजूद रहता है और अमूमन काठ का बना होता है। इसे रखने के लिए किसी भी प्रकार का लाइसेन्स लेने की जरूरत नहीं होती। हमारे यहाँ अपवादों को छोड़कर अनेको घरों में नित्य/नियमित बेलन जैसे अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग से उत्पन्न होने वाली आवाजें सुनाई पड़ती हैं। अनेकानेक खूबियों के बावजूद बेलन घर-परिवार के किचन तक ही सीमित होकर रह गया है। बेलन की बात चली तो हमें जूता याद आने लगा।
जूता………..जिसे उपानह भी कहा जाता है। यह सर्वाधिक प्रचलित प्राचीन पाँव रक्षक है। नॉनवेज और वेजीटेरियन खाद्य पदार्थ की तरह इसका निर्माण चमड़े एवं कपड़े, रैक्सीन आदि से किया जाता है। उपानह……….शब्द का जिक्र द्वापर युग में उस समय हुआ था जब भगवान श्रीकृष्ण से उनके बाल सखा गरीब ब्राम्हण सुदामा मिलने गए थे। उनकी दशा और दर्दुशा का चित्रण भगवान के महल के मुख्य द्वार पर खड़े द्वारपाल ने कुछ इस तरह किया था- ‘‘सीस पगा न झगा तन पै प्रभु, जानै को आहि बसै केहि ग्रामा। धोती फटी सिलटी दुपटी अरू, पाँय उपानह की नहिं सामा।। द्वार खड़यो द्विज दुर्बल एक, रह्यौ चकिसौं वसुधा अभिरामा। पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा।।’’
जूता………….जूता और जूती में अन्तर होता है। यह जब पुरूषों के पाँव में होता है तो जूता कहलाता और जब स्त्रियाँ पहनती हैं तो वह जूती हो जाती है। एक बार किसी मित्र से जूता और जूती में अन्तर पूछा था तो उसने स्पष्ट कहा था कि जो कस के पड़े वो जूता और जो हल्के से पड़े वो जूती……। उसके कहने का अभिप्राय शायद जूतमपैजार को लेकर ही रहा होगा। वैसे जूतियाँ मारने का रिवाज सार्वजनिक है, इसमें मजनू ब्राण्ड लोगों से तंग आकर युवतियाँ अपनी जूतियाँ निकालकर उनके सरों पर चटकाती हैं।
जूता……..उपानह……शूज़…….पनही…….का महत्व शादी-ब्याह में भी काफी देखा जाता है। दूल्हे की सालियाँ उसके जूते चुराकर रस्म रिवाज के अनुसार अपने जीजू से पैसे मांगती हैं और मन वांछित मांग पूरी होने पर जूता वापस करती हैं। बीते महीनों एक समाचार पढ़ा था जिसमें बॉलीवुड अदाकारा प्रियंका चोपड़ा के पति निक जोनस से जूता चुराई में छोटी बहन परिणीति चोपड़ा ने कई करोड़ मांगा था, और जोनस ने अपनी साली की मांग का दुगुना रकद देने का वादा किया था……..शादी में क्या हुआ इसके बारे में जानकारी नहीं………। इस पर लोगों की प्रतिक्रिया यह थी कि शादी आधी घरवाली होती है। इसको दृष्टिगत रखते हुए निक जोनस ने जूता चुराई में काफी पैसे दिए रहे होंगे। जूते का कितना महत्व होता है इसे फिल्मी गीतों में भी बखूबी बताया गया है………उदाहरण के तौर पर—-‘‘दूल्हे की सालियों, ओ हरे दुपट्टे वालियों…..जूते दे दो पैसे ले लो……..। दूल्हे की सालियों, गोरी रंग वालियों हम तुम्हारे हैं दीवाने, शादी वाली रात में जूते चुराती हो, दिल को चुराओ तो जानें……………..।’’
वही उपानह यानि जूता भारत जैसे लोकतंत्रीय व्यवस्था द्वारा संचालित विकासशील देश में अब काफी महंगे दामों पर बिकने लगा है। यह जूता देश की हर छोटी-बड़ी पंचायतों में बात-बात में चलने लगता है। लोग जल-जलपान भले ही न कराएँ परन्तु मन-माफिक काम न होने पर जब उन्हें क्रोध आता है और मान-सम्मान में अन्तर का भान होता है तब जूता जरूर खिला देते हैं। एक नहीं, दो नहीं….जब तक हाथ में शक्ति है तब तक जूते का प्रहार चलता रहता है और इसे ही जूता खिलाना कहते हैं। आमतौर पर इस जूता स्ट्राइक को जूतम-पैजार कहते हैं। जूतमपैजार संसद व विधानसभाओं में बैठे माननीयों द्वारा प्रमुखता से किया जाता है। यह प्रथा गाँव-देहात से लेकर शहरों, मेट्रो सिटीज़ में स्थापित बैठक कक्षों में जारी है।
उत्तर प्रदेश के जनपद सन्तकबीरनगर (खलीलाबाद) में गत 6 मार्च 2019 को जिलायोजना की बैठक में ऐसा जबरदस्त जूतमपैजार हुआ कि उसके वायरल हो रहे वीडियो संवाद ने भारतीय संस्कृति एवं माननीयों के आचरण के बावत सभी को सोचने पर विवश कर दिया। मामला सांसद और विधायक के बीच का है। जूतमपैजार जैसी घटना सन्तकबीरनगर के भाजपा सांसद शरद त्रिपाठी और उसी जिले के मेहदावल विधानसभा क्षेत्र के विधायक राकेश सिंह बघेल (भाजपा) के मध्य हुई। इस घटना के बावत मिली जानकारी के अनुसार जिला योजना की बैठक (जो कलेक्ट्रेट ऑडीटोरियम में आहूत की गई थी) के दौरान सांसद शरद त्रिपाठी को जब यह ज्ञात हुआ कि कराये गए विकास कार्यों से सम्बन्धित शिलापट पर उनका नाम नहीं है तब वह भड़क गए और बैठक में ही पूंछ बैठे कि ऐसा क्यों…..? मैं यहाँ का सांसद हूँ मेरा नाम शिलापट पर क्यों नहीं है?
बात आगे न बढ़े इस पर मेहदावल के विधायक राकेश सिंह बघेल ने स्पष्टीकरण देना चाहा तो सांसद भड़क उठे और तू-तू मैं-मैं………….मैं बड़ा- तू छोटा………आदि के बीच जूतमपैजार शुरू हो गया। किसी भले मानुष ने फोन करके उक्त घटना के बावत अवगत कराते हुए कहा कि अपने फेसबुक एकाउण्ट को खोलकर वायरल वीडियो देखें……….। जिज्ञासा बढ़ गई, उत्सुकता की पराकाष्ठा का अन्त तब हुआ जब उक्त वीडियो देख लिया। आनन्द आया….शरद त्रिपाठी माननीय सांसद बड़े स्मार्ट एवं स्लिम, स्वस्थ एवं फिट पर्सनैलिटी के हैण्डसम हीरो मानिन्द लगे वहीं राकेश सिंह बघेल थुलथुल काया वाले नेता तरह……….। हालांकि जब जूतमपैजार नहीं शुरू हुआ था तब शरद त्रिपाठी अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए विधायक से अपशब्दों को इस्तेमाल करते हुए वाक्युद्ध कर रहे थे तभीं जब उनके मुँह से निकला कि- मैं तुम्हारे जैसों को पैदा करता हूँ………………..इतना सुनते ही विधायक बघेल के मुँह से निकला हुआ वह शब्द वाक्य याद आता है जब उन्होंने कहा कि जूता निकालूँ…………बेचार……..वह तो जूता नहीं निकाल पाए परन्तु स्मार्ट सांसद त्रिपाठी ने जूता निकालकर उन पर जूतों की जबरदस्त बारिश कर दी। इस जूतमपैजार जैसी घटना को सैकड़ो स्मार्टफोन धारकों ने अपने तरीके से रिकार्ड कर वीडियो वायरल किया।
घटना माननीयों के बीच की थी इस लिए प्रशासन और पुलिस महकमे के अधिकारियों के हाथ बंधे थे। वह लोग हाईप्रोफाइल शू-स्ट्राइक को देखकर हतप्रभ तो रहे ही होंगे साथ ही आनन्द भी खूब उठाये होंगे।
मन खिन्न…………लोकतंत्र की गड्डमगड्ड परिभाषाएँ याद आने लगीं। मान-सम्मान और अपमान का अन्तर मस्तिष्क में संचारित होने लगा। एक जबरिया नेताजी मिले बोले यह लड़ाई उच्च और निम्न जाति वर्ग के बीच की है। शरद त्रिपाठी ब्राम्हण हैं और राकेश सिंह बघेल गड़ेरिया जाति के हैं। बर्चस्व की लड़ाई है…….आदि…….आदि……..आदि। शायद उन नेता जी को राकेश सिंह बघेल की जाति का ज्ञान नहीं था, उसकी बात पर हमने यह नहीं कहा कि राकेश सिंह बघेल गड़ेरिया नहीं क्षत्रिय जाति के हैं। जबरिया नेता बेचारे के जो कुछ समझ में आया अपने तरीके से कह डाला। उसने कहा कि देश में जातिवाद का बीज ब्राम्हणों ने ही बोया है, जिसकी परिणति यह है कि वर्तमान में हर तरफ जातिवाद का जहर फैला हुआ है। घोर जातिवाद से त्रस्त, डिप्रेस्ड उस जबरिया नेता की बात समझ में नहीं आई……परन्तु उसकी बेवकूफी भरी बातें सुनकर कुछ लिखने का मन हो आया…….।
कुछ ही दिनों में होली आ जाएगी………..गुझिया, समोसा, पापड़ आदि के निर्माण में बेलन का इस्तेमाल होगा। मुझे घबराहट है कहीं प्रमुख अस्त्र और शस्त्र के रूप में लोकप्रिय एवं चर्चित रहने वाला बेलन जूतम पैजार जैसी परिस्थिति में प्रथम पायदान से खिसक कर द्वितीय पायदान पर न आए जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि आजकल आम खास एवं माननीयों द्वारा जूता इस कदर प्रयोग में लाया जा रहा है जैसे कि वह सर्वथा उपयुक्त अस्त्र और शस्त्र है।

लेखक- भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी,
वरिष्ठ नागरिक/स्तम्भकार,
अकबरपुर-अम्बेडकरनगर (उ.प्र.),
मो.नं.-9454908400

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