
लोकतंत्र श्रेष्ठ प्रणाली है। पर उसके संचालन में शुद्धता हो। लोक जीवन में लोकतंत्र प्रतिष्ठापित हो और लोकतंत्र में लोक मत को अधिमान मिले। यह प्रणाली उतनी ही अच्छी हो सकती है, जितने कुशल चलाने वाले होते हैं। अधिकारों का दुरुपयोग नहीं हो, मतदाता स्तर पर भी और प्रशासक स्तर पर भी। लेकिन दुर्भाग्य से पश्चिम बंगाल में तंत्र ज्यादा और लोक कम रह गया है। इसी का परिणाम है कि वहां लगातार राजनीतिक हिंसा हो रही है, अराजकता का माहौल है, ममता मनमानी कर रही है, अपने कार्यकर्ताओं को भड़का रही है, आक्रामक बना रही है। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास पुराना है। वहां मामूली बातों का लेकर भी अक्सर सत्तापक्ष और विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पंे हो जाती हैं। ताजा घटना में भी विवाद झंडा उतारने को लेकर हुआ और वह इस कदर बढ़ा कि चार कार्यकर्ताओं को अपनी जान गंवानी पड़ी। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं के बीच वैचारिक टकराव स्वाभाविक प्रक्रिया है, पर वह हिंसक रूप ले ले तो उसे किसी भी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता। इसके लिए संबंधित दलों का नेतृत्व जिम्मेदार माना जाता है, क्योंकि वह अपने कार्यकर्ताओं को मर्यादित और लोकतांत्रिक तरीके से व्यवहार करने की सीख देने में विफल होता है। लोकसभा चुनाव के दौरान दोनों पार्टियों के बीच शुरू हुई वर्चस्व की लड़ाई ने वहां एक अनवरत चलने वाली हिंसा का वातावरण बना दिया है, जिसने लोकतंत्र की मर्यादा एवं अस्मिता को ही दांव पर लगा दिया है।
भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी विडम्बना एवं विसंगति है कि यहां हर राजनीतिक दल में कहीं न कहीं इसे लेकर स्वीकार्यता है कि बाहुबल और हिंसा के जरिए अपना दबदबा बनाया जा सकता है। इसीलिए हर राजनीतिक दल आपराधिक वृत्ति के अपने कार्यकर्ताओं के दोष छिपाने का प्रयास करता देखा जाता है। जाहिर है, इससे नीचे के कार्यकर्ताओं में कहीं न कहीं यह भरोसा बना रहता है कि पार्टी के नेता उनकी अराजक एवं हिंसक गतिविधियों पर परदा डालते रहेंगे। बंगाल की हिंसा के पीछे भी यही मानसिकता काम कर रही है। अगर पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व हिंसा के खिलाफ होते, तो वे एक-दूसरे पर दोषारोपण करने के बजाय अपने कार्यकर्ताओं को अनुशासित करने में जुटते, शांति स्थापित करते।
पश्चिम बंगाल में बात केवल राजनीतिक हिंसा एवं आक्रामकता की ही नहीं है बल्कि कुशासन एवं अराजकता की भी है। कोलकाता के एनआरएस मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में 10 जून की रात जो हुआ, वह इसका एक काला अध्याय है। इलाज के दौरान एक बुजुर्ग मरीज की मृत्यु के बाद एक वर्ग विशेष के लोगों ने डाॅक्टरों पर हमला बोल दिया, जिससे कई डॉक्टर गंभीर रूप से घायल हो गए। कुछ तो आज भी अस्पताल में दाखिल हैं। भारत में डॉक्टर को लगभग भगवान का दरजा मिला हुआ है। ऐसे में, आमतौर से उन पर हमला किसी ऐसे निरंकुशता और असंवेदनशीलता की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए, जो तंत्र से पोषित एवं संरक्षित होता है। उसकी हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता, पर इसे किसी शून्य की उपज भी नहीं कह सकते।
पश्चिम बंगाल में कुछ महीनों के बाद विधानसभा चुनाव होने हैं और ममता बनर्जी कमजोर विकेट पर खड़ी हैं। वह चुनाव जीतने के लिए कुछ भी कर सकती हैं। मरने वाला मरीज मुसलमान था, इसलिए सबसे आसान था इस मामले को सांप्रदायिक रंग देना। उन्होंने यही किया, पर वह भूल गईं कि इस बार जिस प्रतिद्वंद्वी से पाला पड़ा है, उसे इस मैदान में शिकस्त देना मुश्किल है। डॉक्टरों को सुरक्षा देने का वादा करने या मारपीट करने वालों की धर-पकड़ कराने की बजाय उन्होंने डॉक्टरों को ही धमकाना शुरू कर दिया। पहले भी उन्होंने मस्जिदों के इमामों को भत्ते देकर या सिर पर पल्लू ढक नमाज पढ़ने की दिलचस्प कोशिश करके सांप्रदायिक धू्रवीकरण किया है, पर इससे हाल ही में सम्पन्न लोकसभा चुनाव में उनका नुकसान ही हुआ है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। फिर भी वे जातीय, साम्प्रदायिक एवं हिंसक राजनीति का सहारा लेने की भूल कर रही है। गरीब एवं अल्पसंख्यक समुदायों को गुमराह करके वे राजनीतिक सफलता की सीढ़िया चढ़ना चाहती है। लेकिन मतदाता भी अब गुमराह होने को तैयार नहीं है। यह समझना होगा कि केवल गरीब एवं अल्पसंख्यक लोगों को बेवकूफ बनाने से कुछ नहीं हो सकता और उनके नाम पर लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने से वोट पक्के नहीं हो सकते। जमाना बदल रहा है, तुम कब बदलोगी ममता बनर्जी! जन भावना लोकतंत्र की आत्मा होती है। लोक सुरक्षित रहेगा तभी तंत्र सुरक्षित रहेगा, यह बात कब ममता को समझ में आयेगी।
पश्चिम बंगाल में ममता की जिस तरह निरंकुशता एवं अराजकता बढ़ रही है, उसी तरह भाजपा के प्रति जनता का विश्वास बढ़ता जा रहा है। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ममता बनर्जी को कड़ी टक्कर देते हुए अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है। भाजपा की यह शानदार एंट्री तृणमूल एवं ममता की बौखलाहट का कारण बन रही है, उसका मलाल भी कहीं न कहीं तृणमूल नेताओं और कार्यकर्ताओं में बना हुआ है। मगर हिंसा एवं अराजकता के जरिए राजनीतिक हैसियत पाने की कोशिश किसी सभ्य समाज की निशानी नहीं हो सकती, लोकतंत्र में तो यह किसी भी रूप में मान्य नहीं है। यदि किसी राज्य में हालात एक सीमा से अधिक बिगड़ते हैैं तो केंद्र सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उन पर न केवल ध्यान दे, बल्कि ऐसे उपाय भी करे जिससे हालात संभलें। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि जब देश के किसी हिस्से में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैैं तो उससे देश की छवि और प्रतिष्ठा पर असर पड़ता है। अब मसला ममता की राजनीतिक अपेक्षाओं का नहीं रहा, देश की प्रतिष्ठा एवं लोकतांत्रिक मूल्यों का है। पश्चिम बंगाल के लोक के लिए, लोक जीवन के लिए, लोकतंत्र के लिए कामना है कि उसे शुद्ध सांसें मिलें। लोक जीवन और लोकतंत्र की अस्मिता को गौरव मिले।
(ललित गर्ग)
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