शहीद राजेंद्रसिंह मोहनगढ़ (जीवन-परिचय)

राजस्थान अपने गौरवमय इतिहास, संस्कृति एवं परंपराओं के कारण विश्वविख्यात हैं | यहाँ के वीर-वीरांगनाओं ने काल के भाल पर कीर्तिगाथाएं मांडकर भारतवर्ष को गौरव प्रदान किया हैं | मानवीय मूल्यों की उदात्त परंपराएं यहाँ की माटी में पुष्पित-पल्लवित हुई हैं | यहाँ के रणबांकुरों ने अपने शौर्य, पराक्रम व बलिदान से अप्रतिम गौरवमय अध्याय बनाये हैं तो यहाँ की वीरांगनाओं ने इस परंपरा को आगे बढा़कर कीर्तिमान स्थापित किये हैं | स्वर्गतुल्या राजस्थान की माटी की वीर-परंपरा को प्रतिबिंबित करता स्व.कुं.आयुवानसिंह हुडील का यह दोहा द्रष्टव्य हैं–
केसर नंह निपजत अठै,
नंह हीरा निकलंत|
सिर कटिया खग झालणा,
इण धरती उपजंत||

इसी वीर-परंपरा का निर्वहन करने वाला सरहदी जिला जैसलमेर सदियों से ‘उत्तर भड़़किंवाड़ के विड़द’ से विभूषित रहा हैं | सदियों से विदेशी आक्रांताओं के समक्ष चट्टान की तरह खड़े होकर माडधरा के लाडलों ने उनके इरादो को नेस्तेनाबूद किया हैं , यह परंपरा अद्यावधि जारी हैं | भारत की स्वतंत्रता के बाद से आज तक 25 रणबांकुरों ने शहादत देकर माडधरा के गौरव को अक्षुण्ण रखा | इसी गौरवमय परंपरा की 26वीं कड़ी थे- नायक राजेंद्रसिंह भाटी, मोहनगढ़ |
जैसलमेर जिले के मोहनगढ़ में हवलदार सांवलसिंह भाटी के घर, माता नैनूकंवर की कोख से 24 दिसंबर,1992 को राजेंद्रसिंह का जन्म हुआ | इनके पिता 1987 में सेना में भर्ती हुए थे, जो 2005 में हवलदार पद से सेवानिवृत्त हुए | बचपन से ही राजेंद्रसिंह होनहार थे | ‘पूत के पग पालने में दिखते हैं’ के अनुरूप राजेंद्रसिंह ने बाल-क्रीड़ाओं में इसे चरितार्थ कर दिया |
प्रारंभिक शिक्षा मोहनगढ़ में प्राप्त करने के बाद आगे के अध्ययन के लिए जोधपुर आये | यहाँ अध्ययन के दौरान श्री क्षत्रिय युवक संघ के संपर्क में आये | संघ की शाखाओं व शिविरों से इन्हें नवीन जीवन-दृष्टि मिली | पारिवारिक व संघ की पृष्ठभूमि के कारण क्षत्रियोचित संस्कार मिले| इसके फलस्वरूप, अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए सन् 2013 में सेना में भर्ती हो गये | 6 राजपूत बटालियन में महत्त्वपूर्ण सेवाएं दी | इसी दौरान 16 अगस्त 2013 को पिता का साया सिर से उठ गया | घर के सबसे बड़े सदस्य होने के कारण सारी पारिवारिक व सामाजिक जिम्मेदारियां इन पर आ गई | राजेंद्रसिंह अपने तीनों भाईयों में सबसे बड़े थे | इससे पूर्व इनकी माता का निधन 2006 में ही हो चुका था | घर में राजेंद्रसिंह के अब वृद्ध दादी ही संरक्षक रही | सन् 8 अगस्त 2016 को राजेंद्रसिंह का विवाह जालोड़ा(फलोदी) जमनाकंवर से हुआ |
मिलनसार, मृदुभाषी, विनोदप्रिय व्यक्तित्व के धनी राजेंद्रसिंह ने बखूबी अपने परिवार को संभालते हुए संबल दिया |
लेकिन, होनी को कुछ और ही मंजूर था | लेफ्टिनेंट कर्नल देवेंद्र आनंद के अनुसार ‘गत 28 दिसंबर को राजेंद्रसिंह भाटी जम्मू में 23 राष्ट्रीय राइफल में सेवा दे रहे थे | इसी समय भारत की विशिष्ट खुफिया एजेंसी द्वारा भारतीय सेना को तीन आतंकवादियों की सूचना मिली | लेकिन, शातिर आतंकवादी गोलियां चलाते हुए जम्मू के बटोटे शहर की ओर भाग गये | रोड ओपनिंग पार्टी ने सेना, जेकेपी , सीआरपीएफ, एसएसबी के साथ संयुक्त रूप से मिलकर आतंकवादियों का पीछा किया | लेकिन, आतंकवादी संपर्क तोड़ने की कवायद से एक घर में घुस गये तथा एक व्यक्ति को बंधक बना लिया | बंधक को सकुशल छुड़ाने हेतु सुरक्षाबलों ने संयम बरता तथा आतंककवादियों को समर्पण करने की पेशकश की , तथापि आतंकी गोलियां चलाते रहे | तत्पश्चात् भारतीय सेना की राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन द्वारा सर्जिकल ऑपरेशन किया गया | इस समय नायक राजेंद्रसिंह के नेतृत्व में बंधक विजयकुमार वर्मा को बचा लिया गया | इस सर्जिकल ऑपरेशन द्वारा आतंकवादियों को पकड़ लिया गया | लेकिन, इससे पूर्व चली गोलीबारी में नायक राजेंद्रसिंह भाटी आतंकवादियों से लड़ते शहीद हो गये | अपने अदम्य साहस, पराक्रम व शौर्य से शहीद राजेंद्रसिंह ने प्राणों की आहुति देकर भारत मां का भाल सदैव के लिए ऊंचा कर दिया | ख्यातनाम राजस्थानी कवि श्री मोहनसिंह रतनू ने शहीद के शहादत पर शब्दांजलि देते हुए लिखा हैं कि-
दी कुरबांणी देह री,अरि आगल अगराज|
सूर गयौ सुरलोक में, रांगड़ भाटी राज||

शहीद के घर में अब उनकी पत्नी जमनाकंवर, दो वर्षीय पुत्र भूपेंद्रसिंह, दो भाई गोविंदसिंह,समुद्रसिंह व 85 वर्षीय दादी जी हैं |

गोपालसिंह रावतपुरा

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