लालबहादुर शास्त्रीजी के जीवन के प्रेरणादायक संस्मरण पार्ट 4

ना कोई लालच और ना ही पद का अभिमान

dr. j k garg
घटना 1965 की है, एक दिन प्रधानमंत्री शास्त्रीजी एक कपड़े की मिल देखने मिल के मालिक, मिल के उच्च अधिकारीयों तथा कई विशिष्ट लोगों के साथ मिल को देखने गये थे। मिल देखने के बाद शास्त्रीजी मिल के गोदाम में पहुंचे तो उन्होंने मालिक को कुछ साड़ियां दिखलाने को कहा। मिल मालिक ने एक से एक खूबसूरत साड़ियां उनके सामने फैला दीं। शास्त्रीजी ने साड़ियां देखकर कहा- ‘साड़ियां तो बहुत अच्छी हैं”, पर इनकी कीमत क्या है?’ मिलमालिक बोला ‘जी, यह साड़ी 800 रुपए की है और यह वाली साड़ी 1000 की है’ | शास्त्रीजी बोले यह तो मेरे बजट से बहुत ज्यादा है, सस्ती साड़ीयां बताओं | दूसरी साड़ियां दिखलाते हुये मिलमालिक बोले देखिये यह साड़ी 500 रुपए की है और यह 400 रुपए की’। ‘अरे भाई, यह भी बहुत महंगी हैं। मुझ जैसे गरीब के लिए कम मूल्य की साड़ियां दिखलाइए, जिन्हें मैं खरीद सकूं।’ शास्त्रीजी बोले। मिल मालिक कहने लगा, ‘वाह सरकार, आप तो हमारे प्रधानमंत्री हैं, आप गरीब कैसे हो सकते हैं ? आप से कीमत कोन मांग रहा है,हम तो ये साड़ियां आपको भेंट कर रहे हैं।’ ‘नहीं भाई, मैं साड़ियाँ भेंट में नहीं लूंगा’, शास्त्रीजी स्पष्ट बोले। ‘क्यों साहब? हमें यह अधिकार है कि हम अपने प्रधानमंत्री को भेंट दें’ | ‘हां, मैं प्रधानमंत्री हूं’, शास्त्रीजी ने बड़ी शांति से जवाब दिया- ‘पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि जो चीजें मैं खरीद नहीं सकता, वह भेंट में लेकर अपनी पत्नी को पहनाऊं। भाई, मैं प्रधानमंत्री हूं पर हूं तो गरीब ही। आप मुझे सस्ते दाम की साड़ियां ही दिखलाएं। मैं तो अपनी हैसियत की साड़ियां ही खरीदना चाहता हूं।’ मिल मालिक की सारी अनुनय-विनय बेकार गई। देश के प्रधानमंत्री ने कम मूल्य की साड़ियां ही दाम देकर अपने परिवार के लिए खरीदीं। ऐसे महान थे हमारे शास्त्रीजी जिन्हें कोई लालच था और ना ही पद का अभिमान, उन्होंने जीवन पर्यन्त अपने पद का कोई फायदा नहीं उठाया ।

ना क्रोध और ना ही शिकायत
साधारणतया लोग घर में तो वजह-बेवजह अधिकार एवं डांट-फटकार से काम करवाते हैं किन्तु घर के बाहर सज्जनता तथा उदारता के प्रतीक बने रहने का स्वागं करते हैं, किन्तु शास्त्रीजी इसके अपवाद थे। वे स्वभाव से ही उदार तथा सहिष्णु थे। ताशकंद जाने के एक दिन पूर्व वे भोजन कर रहे थे। ललिताजी ने उस दिन उनकी पसंद का खिचडी तथा आलू का भरता बनाया था। ये दोनों वस्तुएँ उन्हें सर्वाधिक प्रिय थीं। बडे़ प्रेम से खाते रहे। जब खा चुके उसके थोडी़ देर बाद उन्होंने वही प्रसंग आने पर बडे़ ही सहज भाव से श्रीमती ललिता जी से पूछा-क्या आज आपने खिचडी़ में नमक डाला था ? ललिता जी को अपनी गलती पर बडा दुःख हुआ किन्तु शास्त्रीजी ने न कोई शिकायत की और ना ही गुस्सा, वे तो फीकी खिचडी़ खाकर भी मुस्कराते रहे । शास्त्रीजी कहते थे कि “ भष्टाचार को गम्भीरता से लें तो जरुर अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सकेंगें | लोगों को सच्चा लोकतंत्र और स्वराज कभी भी हिंसा और असत्य से प्राप्त नहीं हो सकता है | जननायक शाष्त्रीजी के 115 वें जन्म दिन पर 132 करोड़ भारतियों का उनके श्री चरणों में नमन|
जय जवान, जय किसान” का नारा भारतवाषियों को हमेशा शास्त्रीजी की याद दिलाता रहेगा |

प्रस्तुतिकरण—-डा.जे.के.गर्ग

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