गांधी से पहले गांधी

सब लोग यह तो जानते हैं कि सन 1893 में स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म संसद में भारत के सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया मगर यह नहीं जानते कि उस उस विश्व सम्मेलन में एक अन्य भारतीय जो 19वीं शताब्दी के प्रकांड जैन विद्वान थे उन्होंने प्रभावशाली ढंग से 3 दिन तक व्याख्यान देकर धर्म संसद में हिंदू संस्कृति और जैन धर्म का डंका बजाकर हिंदुस्तान का परचम अमेरिका की सर जमीन पर लहराया भारत के इस महान सपूत वीरचंद गांधी का जन्म महात्मा गांधी के जन्म से 5 वर्ष पूर्व 25 अगस्त अट्ठारह सौ चौंसठ को गुजरात के महुआ नगर में हुआ इनके पिता श्री राघवजी तेजपाल गांधी महुआ नगर के सुप्रसिद्ध नगर सेठ थे इनकी प्रारंभिक शिक्षा गुजरात में हुई तत्पश्चात उन्होंने मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से ऑनर्स सहित बीए की डिग्री प्राप्त की मुंबई यूनिवर्सिटी से उनकी आगे की शिक्षा हुई तथा बाद में उन्होंने बार एट ला करके बैरिस्टर बने इनके पुत्र का नाम भी मोहनदास था 1893 विश्व धर्म संसद में भारत के जैन धर्म का और भारतीय संस्कृति का प्रखरता से प्रतिनिधित्व किया इतना ही नहीं भारतीय स्वाधीनता के लिए अलख जगाने के लिए अमेरिका जाने वाले प्रथम भारतीय थे अमेरिका के अलावा उन्होंने यूरोप और इंग्लैंड में भी भारतीय स्वतंत्रता के लिए जागृति पैदा करने का कार्य प्रभावशाली ढंग से किया 21 वर्ष की आयु में भारत जैन धर्म संघ के सचिव नियुक्त हुए सन 18 सो 79 में मात्र 15 वर्ष की आयु में इनका विवाह जी बी बेन के साथ संपन्न हुआ 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में भारतीय संस्कृति हिंदू धर्म और जैन धर्म पर 3 दिन तक विद्द्वता पूर्ण भाषण देकर के हिंदुस्तान का परचम अमेरिका की धरती पर फहराया सन 18 सो 84 में श्री वीरचंद राघवजी गांधी जैन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सचिव निर्वाचित किए गए उनके कार्यकाल में कई उल्लेखनीय कार्य संपन्न हुए जिनका जैन समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ा पालीताणा सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ है वहां पर क्षेत्रीय ठाकुर द्वारा पालीताणा तीर्थ यात्रियों पर टैक्स वसूल किया जाता था श्री वीर चंद गांधी ने इसका विरोध किया और पुणे अहमदाबाद मुंबई से कागजात और रिकॉर्ड खट्टा किए और पूरी तैयारी के साथ अंग्रेज अफसरों के साथ मुंबई के गवर्नर लॉर्ड रे और काठियावाड़ के कर्नल जनरल वाटसन के साथ मिले और अपना पक्ष रखा परिणाम स्वरूप व्यक्तिगत कर के बजाय धार्मिक यात्रा के लिए ₹15000 वार्षिक की राशि सुनिश्चित की गई बाद के प्रयासों से तीन चार साल बाद ही वार्षिक राशि भी माफ कर दी गई इसी दौरान आपके विशेष निमंत्रण व प्रयासों से मुंबई के गवर्नर लॉट्रेने शत्रुंजय तीर्थ की यात्रा की और जैन संघ की तरफ से गवर्नर का सम्मान किया गया सम्मेद शिखरजी तीर्थ समग्र जैन समाज के लिए अनंत आस्था का केंद्र है इस तीर्थ क्षेत्र में एक अंग्रेज द्वारा एक बूचड़खाना स्थापित किया गया जिसका श्री गांधी ने पुरजोर विरोध किया तथापि पालगंज के राजा ने उसकी अनुमति दे दी श्री वीर चंद गांधी ने कोलकाता रहकर के 6 महीने तक इसके लिए बंगाली भाषा सीखी और पुरानी फाइलों और रिकॉर्ड का अनुवाद करके कलकत्ता हाई कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया इस गवर्नमेंट को बूचड़खाना बंद करने का आदेश जारी करना पड़ा अपने पिता की इच्छा अनुरूप उन्होंने सामाजिक कुरीतियों का भरपूर भरसक विरोध किया तथा अपनी पिता की मृत्यु के बाद भी कई सामाजिक रूढ़ियों का परित्याग करने के लिए सामाजिक जागृति पैदा की जैन मुनि श्री आत्माराम जी महाराज साहब श्री वीरचंद राघवजी गांधी के गुरु थे और उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने विश्व धर्म संसद में भारत का प्रतिनिधित्व किया l इस वर्ष भारत के इस महान सपूत की 155 वर्षगांठ है । इस अवसर पर इस महान विभूति को शत शत नमन , श्रद्धांजली !

बी एल सामरा “नीलम “
श्री वीर चंद गांधी वेशभूषा से स्वामी विवेकानंद की तरह ही लगते थे और उनका आयुष्य भी लगभग समान ही था । उन्होंने विश्व धर्म सम्मेलन में जैन धर्म पर बहुत ही प्रभावशाली ढंग से 11 सितंबर 25 सितंबर और 27 सितंबर 1893 को 3 दिन धर्म संसद में व्याख्यान दिया । विश्व धर्म संसद के समापन के पश्चात भी वीरचंद गांधी 2 वर्ष तक अमेरिका प्रवास पर रहे । इसके पश्चात तीन बार और अमेरिका तथा यूरोप के प्रवास पर गए तथा वहां पर भारतीय संस्कृति सनातन धर्म एवं अहिंसा और वसुदेव कुटुंबकम पर उन्होंने 535 व्याख्यान दिए । वर्ष 1901 में खराब स्वास्थ्य के कारण वे भारत लौट आए परंतु उनके स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ । अंततोगत्वा 7 अगस्त 1901को भारत का यह महान सपूत मौत के आगोश में समा गया । इस आलेख की यह समग्र जानकारी अजमेर में भारतीय जीवन बीमा निगम के पूर्व शाखा प्रबंधक बी एल सामरा जो जैन दर्शन राजभाषा और विरासत में गहरी अभिरुचि रखते हैं ,उनके सौजन्य से प्राप्त हुई। स्वामी विवेकानंद के साथ श्री वीर चंद गांधी शिकागो सम्मेलन में शामिल हुए थे ,वे न केवल जैन समुदाय के विद्वान थे, बल्कि एक बैरिस्टर भी थे ।उनका 35 वर्ष की अल्प आयु में निधन हो गया । गुजरात के एक जैन परिवार में जन्मे और मुंबई में निवास करने वाले ये युवक एक प्रखर तेजस्वी महापुरुष थे , जिसने सारी दुनिया में हमारे देश का गौरव बढ़ाया और विश्व धर्म सम्मेलन में जैन धर्म पर प्रभावी ढंग से 3 दिन तक व्याख्यान दिया और हमारी संस्कृति का परचम फहराने का शानदार कार्य किया जिसका नाम आज विस्मृत कर दिया गया है ।श्री वीर चंद जी की 155 जयंती पर हम उनका श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं , उनका देश की आजादी की अलख जगाने में योगदान किसी स्वतंत्रता सेनानी से कम नहीं है। उन्होंने अमेरिका इंग्लैंड और यूरोप में हमारी हमारे देश की संस्कृति का परचम लहराया और गौरव बढ़ाया ऐसे महापुरुष को शत-शत नमन और भावपूर्ण श्रद्धांजलि के साथ उनका फोटो भी संलग्न है ।गुजरात की धरती का एक और गांधी जिसने सारी दुनिया में हमारी देश की संस्कृति अहिंसा और सनातन धर्म का परचम फहराने का शानदार कार्य किया यह वर्ष उनकी 155 वी वर्षगांठ का है। इस महापुरुष का योगदान स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी से कम नहीं है ,आज जब सारा देश महात्मा गांधी की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है , तो उनसे 5 वर्ष पूर्व गुजरात की धरा पर जन्म लेने वाले इस दूसरे गांधी को देश की जनता ने लगभग विस्मृत कर दिया है । इस अवसर पर हार्दिक श्रद्धांजलि!

आलेख सौजन्य
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बीएल सामरा नीलम
सेवानिवृत्त शाखा प्रबंधक भारतीय जीवन बीमा निगम अजमेर

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