पाश्चात्य और भारतीय काल गणना

हनुमान सिंह राठौड़
आजकल जो ईस्वी सन् के रूप में प्रसिद्ध है, उसका ईसाई रिलिजन या ईसा के जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। मूलरूप से यह उत्तरी यूरोप के अर्धसभ्य कबीलों का कैलेण्डर था, जो मार्च से अपना नया वर्ष प्रारम्भ करते थे। प्रारम्भ के दो महीने शीत निष्क्रियता में बीतते थे। इस समय गुफाओं में रहने के कारण वे शेष दुनियाँ से कटे रहते थे, इसलिए इन दिनों की वे वर्ष में गणना ही नहीं करते थे। इस कैलेण्डर में दस महीने व 304 दिन होते थे। इन दस महीनों के नाम भी संस्कृत से व्युत्पन्न थे जैसे – सातवें, आठवें, नवें तथा दसवें मास के नाम क्रमशः सेप्टेम्बर (सप्त), ओक्टाम्बर (ओक्ट = अष्ट), नवम्बर (नवम्), दिसम्बर (दशम्) थे। ग् . डंे का अर्थ एक्स-मस या क्रिसमस नहीं है। रोमन में ग् अर्थात दस होता, अतः यह दशम्-मास है।
इस कैलेण्डर में सर्वप्रथम संशोधन रोमन सम्राट जूलियस सीजर ने किया। इसे ही रोमन कैलेण्डर कहते हैं। आज के तथाकथित ईस्वी सन् के 44 वर्ष पूर्व जूलियस सीजर ने मिश्र पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में अपना संशोधित कैलेण्डर प्रचलित किया। इसके लिए उसकी सहायता मिश्र के प्रसिद्ध ज्योतिषि व खगोलशास्त्री सोसीजेनेस ने की। यह कैलेण्डर 365( (सवा तीन सौ पैसठ दिन) का था। वर्ष के इन दिनों की गणना के लिए चार साल के अंतराल में एक लीप ईयर की व्यवस्था की गई। यह दिन की घटत-बढ़त फरवरी में ही क्यों की ? यह भी रोचक तथ्य है। जूलियन कैलेण्डर के मास क्रम या उन के दिनों की संख्या का खगोलीय घटना या गृह – नक्षत्रों की गति से कोई सम्बन्ध नहीं है। दस माह के कैलेण्डर में दो मास बढ़ाने थे अतः रोम सम्राट जूलियस ने अपने नाम से जुलाई तथा सम्राट आगस्टस ने अगस्त जोड़ दिया। दोनों सम्राट थे। अपने-अपने महीने 31 दिन के कर लिए, भुगतना फरवरी को पड़ा, उसे 28 दिन पर ही संतोष करना पड़ा। उसके साथ हुए अन्याय की भरपाई के लिए ‘‘लीप ईयर’’ का एक दिन उसे कृपापूर्वक देने की घोषणा की गई।
वर्तमान ईस्वी सन् जूलियन कैलेण्डर के लगभग 530 वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद प्रारम्भ हुआ। है ना आश्चर्यजनक, ईस्वी सन् के पैदा होने के 530 वर्ष पहले के काल खण्ड का नामकरण ईस्वी सन् करते हैं और उससे पूर्व का ईसा पूर्व। एक सीथियन पादरी डायोनिसियस एक्सीजुअस ने अपनी गणना लगाकर ईसा का जन्म दिवस 25 दिसम्बर निर्धारित किया और जूलियन कैलेण्डर को ईसा के जन्म से सम्बद्ध कर ईस्वी सन् प्रचलित कर दिया।
25 दिसम्बर यूरोप व एशिया के कई देशों जैसे मिश्र, बेबिलोन (इराक), फारस (इरान) में मित्र अर्थात सूर्य की पूजा का परम्परागत उत्सव था। मिश्र भी सूर्य के पर्यायवाची शब्द ‘मित्र’ का ही अपभुंश उच्चारण है।
जूलियन कैलेण्डर भी परिपूर्ण नहीं है। यह समायोजन केवल भारतीय पंचांग में ही सम्भव है। कैलेण्डर पंचांग नहीं है। पंचांग में पाँच गणनाएँ – तिथि, वार, नक्षत्र, करण और योग होती हैं। पंचांग खगोलीय घटनाओं का दिग्दर्शक जीवमान अभिकरण है, कैलेण्डर शुष्क गणनाओं की गणित-विहीन जोड़-तोड़ की टिप्पणी है।
गणना की त्रुटि सुधारने के लिए ही पोप ग्रेगरी तेरहवें ने एक आज्ञा प्रसारित कर कैलेण्डर को एक ही दिन में दस दिन आगे बढ़ा दिया, अर्थात 05 अक्टूबर शुक्रवार को 15 अक्टूबर शुक्रवार माना गया। यद्यपि पोप का आदेश मानने के लिए ईसाई देश बाध्य थे, किन्तु इस परिवर्तित ग्रेगोरियन कैलेण्डर को यूरोप के देशों ने आसानी से नहीं अपनाया। पोप ने 1572 ईस्वी में आदेश प्रसारित किये थे, किन्तु इंग्लैण्ड ने इसे 1752 ईस्वी में अपनाया। चीन, अलबानिया, बलगेरिया, रूस, रोमानिया ग्रीस, तुर्की आदि देशों ने तो इसे बीसवीं सदी में स्वीकार किया। भारत में भी यह अंग्रेजों का शासन स्थापित होने के बाद राजाज्ञा से प्रचलित किया गया। यह कैलेण्डर न किसी खगोलीय गणना पर आधारित है, न प्रकृति चक्र पर। इसके महीनों में दिनों की संख्या का भी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
भारतीय काल गणना अत्यन्त वैज्ञानिक सटीक तथा प्रकृति व खगोल की घटनाओं के अनुरूप है। इसीलिए हमारे दैनिक व्यवहार, व्रत-त्यौहार, विवाह आदि शुभ कार्य यहाँ तक कि शोक प्रसंग भी पंचांग के अनुसार होते हैं, दिनांक के अनुसार नहीं। भारत में ग्रह-नक्षत्रों व सौर मण्डल की परिघटनाओं का अध्ययन करने के लिए सौर वर्ष है। जैसे यह भ्रांति है कि मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही आती है। स्वामी विवेकानन्द का जन्म मकर संक्रांति को हुआ था। उस दिन 12 जनवरी थी। वास्तव में मकर संक्रांति सौर माघ मास की प्रतिपदा को आती है,, यह खगोलीय सत्य है। सूर्य, चन्द्र ग्रहण, समुद्र में ज्वार-भाटे, पूर्णिमा, अमावस्या की पूर्व घोषणा हिन्दू पंचांग से सम्भव है, ग्रेगोरियन कैलेण्डर से नहीं।
दैनिक जीवन में तिथियों की गणना चन्द्रमास से ही की जाती है, यह व्यावहारिक है। इस्लाम में भी चन्द्र मास प्रचलित है किन्तु गणना अवैज्ञानिक है क्योंकि सौर वर्ष से इसका समायोजन नहीं किया जाता। हिन्दू मास में सौर वर्ष से समायोजन के लिए ही अधिक मास या पुरूषोत्तम मास की व्यवस्था की गई है। पंचांग में पूर्णिमा व अमावस्या की घोषणा को एक बालक भी आकाश की तरफ देखकर अनुभव कर सकता है। तिथियों की घटत-बढ़त भी वैज्ञानिक है, सूर्योदय के आधार पर तिथि का निर्धारण होता है।
प्राचीन गणनाओं को छोड़ भी दिया जाय और केवल कलियुग की गणना को ही देखें तो भारतीय खगोल शास्त्रियों की विलक्षण प्रतिभा के दर्शन होते हैं। इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को कलियुग के 5121 वर्ष पूर्व होकर 5122वाँ वर्ष प्रारम्भ होगा।
पाटलीपुत्र के प्रसिद्ध खगोल शास्त्री आर्यभट्ट ने उस समय गणना करके बताया कि जब 23 वर्ष के थे तब कलियुग के 3600 वर्ष व्यतीत हो चुके थे। इस आधार पर कलियुग का प्रारम्भ ईसा पूर्व सन् 3102 में हुआ। उनकी इस खगोलीय गणना का आधार यह था कि कलियुग के प्रारम्भ के दिन सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य सभी ग्रह अपने परिक्रमा पथ के एक ही कक्ष में एक साथ थे। कलियुग के प्रारम्भ के दिन तथा वर्तमान श्वेत वाराह कल्प के प्रारम्भ के दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि तथा रविवार था, ऐसा सभी प्राचीन ज्योतिर्विदों का मत था।
जिस मास की पूर्णिमा को जो नक्षत्र पड़ता है, उसी के आधार पर भारतीय मासों के नाम होते हैं – चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन – ये सभी नाम नक्षत्रों के आधार पर ही हैं। इस प्रकार विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक काल गणना से निर्मित पंचांग हमारी थाति है, इसके गौरव का स्मरण व पुनस्र्थापन के संकल्प का दिन नव सम्वत्सर है।

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