नववर्ष (संवत्सर) युगाब्द 5122, विक्रम संवत् 2077 की चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

कंवल प्रकाश किशनानी
भारतीय सांस्कृतिक गौरव की स्मृतियाँ समेटे हुए अपना नववर्ष (संवत्सर) युगाब्द 5122, विक्रम संवत् 2077 की चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, तद्नुसार 25 अप्रेल, 2020 को प्रारंभ हो रहा है।
सर्वस्पर्शी एवं सर्वग्राह्य भारतीय संस्कृति के दृष्टा मनीषियों और प्राचीन भारतीय खगोल-शास्त्रियों के सूक्ष्म चिन्तन-मनन के आधार पर की गई कालगणना से अपना यह नव-संवत्सर पूर्णतरू वैज्ञानिक एवं प्रकृति-सम्मत तो है ही, हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं सांस्कृतिक ऐतिहासिक धरोहर को पुष्ट करने का पुण्य दिवस भी है –
ऐतिहासिक महत्त्व रू-
1. ब्रह्मपुराण के अनुसार पूर्णतरूजलमग्न पृथ्वी में से सर्वप्रथम बाहर निकले भू-भाग सुमेरु पर्वत पर 1 अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार 121 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की।
2. मर्यादा-पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के लंका विजय के बाद अयोध्या आने के पश्चात् यही मंगल-दिन उनके राज्याभिषेक के लिए चुना गया।
3. शक्ति एवं भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है।
4. सनातन धर्म की रक्षा के लिए वरुणावतार झूलेलाल जी आज ही के दिन अवतरित हुए।
5. समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
6. सामाजिक समरसता के अग्रदूत डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म भी आज ही के दिन हुआ।
7. आज से 2077 वर्ष पूर्व राष्ट्रनायक सम्राट् विक्रमादित्य ने विदेशी हमलावर शकों को भारत की धरती से खदेड़ा। अभूतपूर्व विजय के कीर्ति स्तंभ के रूप में कृतज्ञ राष्ट्र ने कालगणना को विक्रमी संवत् कहकर पुकारा।
8. अधर्म पर धर्म का वर्चस्व स्थापित करने वाले सम्राट् युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ।
9. अपने राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाकर भारत माता को पुनरू जगद्गुरू के सिंहासन पर आसीन करने के ध्येय को लेकर चल रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक पूजनीय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म भी वर्ष प्रतिपदा के मंगल-दिन ही हुआ।
10. मंत्र दृष्टा एवं न्यायदर्शन के आदि प्रवर्तक ऋषि गौतम का जन्म भी वर्ष-प्रतिपदा को ही हुआ।
11. महाराजा अजयपाल ने आज ही के दिन राजस्थान की हृदयस्थली अजयमेरु की स्थापना की।
12. गुरुमुखी के रचनाकार एवं सिक्ख पंथ के द्वितीय गुरु अंगददेव का प्रकाशोत्सव भी आज ही के पावन दिवस पर है।
वैज्ञानिक महत्त्व रू-
1. भारतीय कालगणना के अनुसार सृष्टि का निर्माण हुए अब तक 1972949121 वर्ष बीत चुके हैं। आज विश्व के वैज्ञानिक इस तथ्य को स्वीकार करने लगे हैं।
2. भारतीय कालगणना विशुद्ध वैज्ञानिक प्रणाली है, इसमें सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक सैकण्ड के सौवें भाग का भी अंतर नहीं आया है।
3. भारतीय कालगणना के समय की सबसे छोटी इकाई का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। त्रुटि सैकण्ड का 33750वाँ भाग है। सबसे बड़ी इकाई कल्प 432 करोड़ वर्ष का होता है। इस कल्प का वर्तमान में 7वाँ मन्वन्तर है, जिसका नाम वैवस्वत है। वैवस्वत मन्वन्तर की 71वीं चतुर्युगियों में से 27 बीत चुकीं हैं। 28वीं चतुर्युगी में भी सतयुग, त्रेता, द्वापर बीतकर कलियुग के 5120 वर्ष बीत चुके हैं।
4. सृष्टि का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा रविवार को सूर्य के प्रथम प्रकाश के साथ हुआ, इसलिए इस दिन प्रथम होरा रवि का था। पश्चात् चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि का हो गया, जिन पर सातों दिनों का नामकरण किया गया, जिन्हें आज सम्पूर्ण संसार मानता है।
5. चन्द्रग्रहण एवं सूर्यग्रहण जैसी घटना अचूक रूप से पूर्णिमा एवं अमावस्या को ही होती हैं।
प्राकृतिक महत्त्व –
इस तिथि के आस-पास प्रकृति में नवीन परिवर्तन एवं उल्लास दिखाई देता है। रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं। वृक्ष एवं लताएँ पुष्पित-पल्लवित होती दिखाई देती हैं। खेतों से फसल कटकर घर में आना प्रारंभ हो जाती है। सूर्य की किरणें पृथ्वी को ऊर्जामयी करने लगती हैं। नक्षत्र शुभ स्थिति में होने से नए कार्यों के प्रारंभ का शुभ मुहूर्त होता है। समाज में उत्साह एवं आनंद का वातावरण दिखाई देता है।
भारतीय संविधान की भावना के अनुसार-
भारतीय कालगणना, संवत्सर किसी विचार या पंथ पर आश्रित नहीं है। अतरू किसी जाति या संप्रदाय विशेष की नहीं है। हमारी गौरवशाली परम्परा विशुद्ध अर्थों में प्रकृति के खगोल-शास्त्रीय सिद्धांतों पर आधारित है। अतरूविक्रमी संवत् का वैचारिक आधार हमारे गणतंत्र में मान्य वर्तमान पंथ-निरपेक्ष स्वरूप को भी पुष्ट करता है।
वर्ष प्रतिपदा के आस-पास ही पडने वाले अंग्रेजी वर्ष के मार्च-अप्रेल से ही दुनिया भर के पुराने कामकाज समेट कर नए कामकाज की रूपरेखा तय की जाती है, चाहे फिर व्यापारिक संस्थानों का लेखा-जोखा हो, करदाता का कर निर्धारण हो या सरकार का बजट।
जब हमारे पास राष्ट्र की दृष्टि से विजयी, विज्ञान की दृष्टि से समयोचित, प्रकृति की दृष्टि से समन्वयकारी, खगोलशास्त्र की दृष्टि से पूर्ण और धार्मिक दृष्टि से पंथ-निरपेक्ष एवं स्वदेशी कालगणना है तो विदेशी, अपूर्ण, अवैज्ञानिक एवं पांथिक कालगणना की ओर अंधाधुंध क्यों भागें? आइए, अपनी-श्रेष्ठ परम्पराओं का अनुसरण करते हुए फिर से एक बार उठें और समूचे विश्व में भारतीय गौरव को प्रतिष्ठित करें

इस तरह करें नववर्ष का स्वागत
’ नववर्ष की पूर्व संध्या पर घरों के बाहर दीपक जलाकर नववर्ष का स्वागत करना चाहिए।
’ नववर्ष के नवप्रभात का स्वागत शंख ध्वनि व शहनाई वादन करके किया जाना चाहिए।
’ घरों, मंदिरों पर ऊ अंकित पताकाएं लगानी चाहिए तथा प्रमुख चैराहों, घरों को सजाना चाहिए।
’ यज्ञ-हवन, संकीर्तन, सहभोज आदि का आयोजन कर उत्साह प्रकट करना चाहिए।
’ अपने मित्रों व संबंधियों को नववर्ष बधाई संदेश भेजने चाहिए।
’ भारतीय कालगणना एवं इसके महत्त्व को उजागर करने वाले लेखों का प्रकाशन एवं गोष्ठियों का आयोजन करना चाहिए।

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