
मन तो सब कुछ जाने रे ।
अलग-अलग है रस्ते सबके,
जाना एक ठिकाने रे ।
मिलना होगा उसी छोर पर,
किसी नाव में बैठो तुम ।
ये मेरी है वो मेरी है ,
ये तो सिर्फ़ बहाने रे ।
धन-दौलत तो उसको कहते,
साथ हमारे जाए जो ।
बाकी सब कुछ सिर्फ़ मोह है,
फिर भी लोग दीवाने रे ।
प्रेम -भाव से बढ़े एकता ,
मैंने तो यह जाना है ।
मिलजुलकर रहने वाले ही ,
लगते सदा सुहाने रे ।
भागदौड़ से भरी ज़िंदगी,
मुश्किल से आराम मिला ।
यही समय मंथन करने का,
कुछ-कुछ ख़ुद को जाने रे ।
– *नटवर पारीक*, डीडवाना