विश्व पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस की सभी को बहुत-बहुत बधाई

विश यू वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे या विश्व पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस की सभी को बहुत-बहुत बधाई। जिस प्रकार दो भाषाओं में सुनने पर अलग-अलग असर देखा जा सकता है ऐसा ही है यह विश्व पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस। एक तरफ पत्रकारों को स्वतंत्रता देते हैं बोलने और लिखने की और जब वह उसका प्रयोग करते हैं तो उस पत्रकार को या तो मौत के घाट उतार दिया जाता है या जेल में डाल दिया जाता है। एक आश्चर्य की बात और बताऊं दोस्तो इस दिवस के उपलक्ष में जो एक अवार्ड दिया जाता है जिसका नाम है गिलर्मो केनो विश्व प्रेस स्वतंत्रता पुरस्कार। पिछले साल 2019 में यह अवार्ड दो व्यक्तियों को साझा रूप में दिया गया जिन्होंने रोहिंग्या पर डॉक्यूमेंट्री बनाई थी। परंतु वह दोनों 7 साल की सजा काट रहे हैं जेल में। बड़ा चुनौतीपूर्ण पेशा है पत्रकारिता परंतु कहते हैं ना कि यह वह नशा है कि जो एक बार चढ़ जाए तो सिर चढ़कर बोलता है। मन में एक विचार आया है क्यों ना दोस्तों आपसे साझा कर लूं काश ऐसा कैमरा होता जो दिल की नफरत या प्रेम को पढ़ पाता तो शायद सही गलत का फैसला करना बहुत ही आसान हो जाता, यह तो संभव नहीं है अभी परंतु आज मैं आपको अपने दिल की बात इस कैमरे के माध्यम से जरूर आप तक पहुंचा रही हूं।
इस विकट समय में जहां मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री से प्रत्येक स्तर पर सहायता मिल रही है चाहे वह किसी भी तबके का हो परंतु मैं बात करती हूं हम पत्रकारों की तो क्या लघु एवं मझोले समाचार पत्रों के पत्रकारों को कोई सहायता दी गई है??? बड़े-बड़े मीडिया घरों का काम तो विज्ञापनों से आसानी से चल जाता है। परंतु क्या कभी सरकार ने उस पत्रकार के बारे में सोचा है, जिसके पास भी परिवार है, बच्चे हैं, मां-बाप है, सभी खर्चे हैं दूसरों की तरह ही। परंतु नहीं है तो कोई भी सहायता। मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं एक छोटे से उदाहरण से कि मनरेगा कर्मचारी को भी 100 दिन का काम सरकार जरूरी मानती है। चिकित्सा, पुलिस कर्मी,सफाई कर्मी के साथ सब गरीबों का भी कोई वजूद मानती है और सहायता भी कर रही है। परंतु एक पत्रकार का कोई वजूद नहीं मानती वह तो मनरेगा कर्मचारी से भी नीचे रखा गया है 27000 तो एक मनरेगा कर्मचारी भी कमा सकता है। परंतु हमारा क्या? हम तो पत्र खाकर और पत्र पढ़कर ही अपना पेट भरे क्योंकि यह हमारा फैसला है कि हमें अपने समाज के प्रति जिम्मेदारी निभानी ही है। सरकार का ध्यान आकर्षित होगा या नहीं यह तो मैं नहीं जानती परंतु सरकार को इस विषय की और ध्यान देने की आव्यशकता है।
दूसरा विचार मेरे मन में और आया है- राजस्थान में जितने भी प्रेसक्लब बने हुए हैं और उन क्लबों में पत्रकार कल्याण कोष बने हुए हैं या पत्रकार कल्याण कोष नहीं भी बने हुए हैं तो भी ऍफ़ डी के रूप में लाखो रूपए की पूंजी उपलब्ध हैं। तो क्या इस आपात समय मे उस पूंजी से पत्रकार भाइयो की मदद नही की जा सकती या नहीं की जानी चाहिए ? कल्याण कोषों का गठन आपात स्थिति से निपटने के लिए ही किया गया है। हो सकता है मदद आंशिक ही होगी परंतु नी मामा से तो काना मामा अच्छा होता है। मेरा ऐसे विचार आना सही है या गलत यह तो मैं नहीं जानती परंतु अजमेर हमेशा से कई चीजों में अव्वल रहा है प्रथम रहा है तो मैं यहां के प्रधानों से यह अपील करना चाहती हूं आप सब के माध्यम से क्यों ना एक नया इनोवेशन भी अजमेर से ही शुरू किया जाए आज प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर। बात लिखने को तो मैं एक पत्रकार होने के नाते स्वतंत्र हूं तो मैंने अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग किया और लिख दिया। अब आगे आजकल रामायण महाभारत आप लोगो द्वारा देखी जा रहे हैं और सद्भावनाओ का प्रभाव तेज हो गया हो तो शायद उसी को दिखाने का और मैत्री भाव निभाने का सही समय यही है।
डॉ रशिका महर्षि
महासचिव मीडिया फोरम

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