सोशल मीडिया ने घर-घर पत्रकार पैदा कर दिए

पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने शादी बारात की वीडियो बनाने वालों को पत्रकार बना दिया, और अब सोशल मीडिया ने घर घर पत्रकार पैदा कर दिए। जिसे देखो you ट्यूब पर किसी भी घटना का वीडियो डाल कर कहता है कि न्यूज़ कवरेज। सबसे पहली बात तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया के you tube चेनल वाले पत्रकार हैं ही नहीं। “पत्रकार” शब्द से ही स्पष्ट है कि “पत्र” में कार यानी “कार्य” करने वाला। पत्र यानी समाचार पत्र अर्थात अखबार। पत्र माने चिट्ठी, यानी पत्रकारिता लेखन का कार्य है, ना कि बकवास करने का।
इलेक्ट्रॉनिक व you ट्यूब वाले सिर्फ मीडिया कर्मचारी हैं। इधर वीडियो शूट किया, और उधर एक दो लाइन का एंकरिंग पार्ट डाल कर बाकी जानकारी लोगों की बाइट्स अथवा फुटेज चला कर न्यूज़ दिखा दी। दरअसल यह काम कोई भी कर सकता है, बल्कि अब तो हर कोई ही कर रहा है। जैसा ऊपर अर्ज़ किया कि कम पढ़े लिखे औऱ रोजी रोटी के लिए शादी ब्याह में वीडियोग्राफी करने वाले so called पत्रकार के रूप में स्थापित हो गए हैं। ईश्वर उनकी रोजी रोटी चलाते रहें। मगर, लेखन बिना पत्रकार कैसा।
मुझे भी एक किस्सा याद आता है। एक चैनल में नौकरी करते समय एक सिफारिशी भर्ती लड़का new commer आया। उच्चाकांक्षाएँ और सिफारिश का जोम भी इतना था के सीधे वरिष्ठ लोगों के बराबर आने को उतावला। वो ऐसी हिमाकत कर भी सकता था, क्योंकि जिस नेपोटिज़्म, सिफारिश, पक्षपात, भेदभाव को लेकर आज कल मीडिया फ़िल्म एक्ट सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या को भुना रहा है, यही गन्दगी इस मीडिया व पत्रकारिता लाइन में जड़ें जमा चुकी हैं। बहरहाल, मैं कह रहा था कि वो लड़का आया और अपने गॉड फादर के दम पर रिपोर्टर बन कर काम करने लगा। मगर जब चेनल के दिनमान खराब आये और दुकान बंद हुई तो उस लड़के को नई नौकरी तलाशनी थी। हुआ यूं के चैनल बंद होने के बाद उसने राज्य स्तरीय और एक राष्ट्रीय अखबार में जाकर नौकरी के लिए साक्षात्कार दिया, मगर उसका रिज्यूम रिजेक्ट कर दिया गया, क्योंकि उसे लिखना तो आता ही नही था। लब्बोलुआब ये कि किसी कैमरामैन / वीडियोग्राफर के साथ फील्ड पर जाना और आयोजकों से प्रेसनोट लाकर चेनल के दफ्तर में कंटेंट एडिटरों को दे देना पत्रकारिता नही होती। यह काम तो चाय की दुकान पर प्याले धोने वाला लड़का भी कर लेगा।
आज ईश्वर की कृपा से कई ऐसे ही टाइप के मीडिया वालों का काम चल रहा है। उनमें से जिन्होंने मीडिया को ही पेशा बनाने का सीरियसली सोचा, तो उन्होंने काम को सीखा और कई ऐसे लोग अपने हुनर से सफल इलेक्ट्रोनिक मीडिया कर्मचारी बने, उन्हें बधाई। मगर पत्रकार वो अब भी नही बने, क्योंकि आज भी यदि वे किसी अखबार में जॉब करने जाएंगे, तो कोई इक्का दुक्का को छोड़ सब रिजेक्ट हो जाएंगे, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो स्तरहीन खबरों की दुकान है, बेबात की बातों से दर्शकों को पकाने के अलावा उनके पास कोई हुनर नही। जबकि प्रिंट मीडिया पत्रकारिता की पाठशाला है। प्रिंट मीडिया वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सफलता से काम कर सकते हैं, मगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जर्नलिज़्म शुरू करने वालों में से कोई एक आध फीसदी ही होगा जो प्रिंट मीडिया में चल सके।
जिसने विज्ञप्ति लिखनी नही सीखी, जिसे कंटेंट की जानकारी नहीं, जिसे शब्द ज्ञान अधूरा आता हो, जिसका भाषा ज्ञान शून्य अथवा ना के बराबर हो, वो किसी भी भाषा शैली में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कुछ भी बोल कर काम चला लेगा, क्योंकि tv पर बोलना भले बीस मिनट तक है, मगर गिनी चुनी चार लाइन बोलनी हैं उस बीस मिनट में चालीस बार। और उन्हें ही यदि चालीस लाइन की एक अखबार की खबर लिखने को दे दें तो दस बार पेन हाथ से गिर जाएगा।

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