गहलोत ने वसुंधरा राजे का क्यों किया जिक्र

बहुत सियासी मायने हैं, बोले-वसुंधरा जैसा कोई भी दमदार नेता नहीं भाजपा में।
रजनीश रोहिल्ला।
राजस्थान की सियासी लड़ाई के आर-पार का दौर शुरू हो गया है। जहां एक ओर भाजपा पायलट के पक्ष में बात करती नजर आ रही है। वहीं आज अशोक गहलोत ने भी भाजपा खेमे पर वार करते हुए वसुंधरा राजे का नाम लेकर नए सियासी संकेत दे दिए हैं।
गहलोत ने पहले जैसलमेर और फिर जयपुर में कहा में भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा कि भाजपा के नए नए नेता वसुंधरा राजे को टक्क्र देना चाहते हैं, मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहे हैं। लेकिन भाजपा के इन नेताओं में इतना दम नहीं है कि वो ऐसा कर सकें।
गहलोत का यह बयान ऐसे समय आया है, जब विधानसभा में बहुमत साबित करने की चैसर बिछनी शुरू हो चुकी है।
गहलोत के इस बयान के बहुत सियासी मायने हैं, गहलोत ने वसुंधरा की बात करके बीजेपी की सबसे प्रभावशाली नब्ज पर हाथ रख दिया है। राजस्थान का सियासी घमासान चरम पर है। 14 अगस्त का सबको बेसब्री से इंतजार है। खेल अभी बहुत बाकी है, पर्दे के आगे भी और पीछे भी। राजनीति का अर्थ ही यह है राज करने की नीति। नीति की अपनी कोई स्थाई परिभाषा नहीं।
राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा के अलावा कोई ऐसा तीसरा दल नहीं जो दोनों को चुनावी पटकनी दे सके। इसलिए 5 साल कांग्रेस तो 5 साल भाजपा का राज होता है।

रजनीश रोहिल्ला
पिछले 22 साल से कांग्रेस से अशोक गहलोत और भाजपा से वसुंधरा राजे एक के बाद मुख्यमंत्री बन रहे हैं। 22 साल के इस सफर में गहलोत तीसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं, जबकि वसुंधरा राजे दो बार मुख्यमंत्री रह चुकी है।
वसुंधरा राजे को भैरोसिंह शेखावत जैसे नेता राजस्थान की राजनीति में लाए थे। यहीं वसुंधरा राजे राजस्थान की सबसे शक्तिशाली जननेता के रूप में उभरी।

हालांकि आज गुलाबचंद कटारिया, राजेंद्र राठौड़ और सतीश पूनिया के रूप में भाजपा के तीन ही चेहरे प्रमुखता से नजर आ रहे हैं, स्वाभाविक है सवाल तो उठेगा सियासत के इस महासंग्राम में जब कांग्रेस और भाजपा के बीच आर-पार की लड़ाई का दौर चल रहा हो, तब वसुंधरा राजे कहां है।

सवाल तो और भी उठ रहे हैं, क्या वसुंधरा राजजे को भाजपा में किनारे किया जा रहा है। क्या राजस्थान भाजपा की भविष्ष्य की राजनीति में वसुंधरा राजे के लिए कोई स्पेस नहीं है। क्या भाजपा नेतृत्व तय कर चुका है कि सारे प्रमुख निर्णयों में जरूरी नहीं है कि वसुंधरा की राय ली जाए।
हालांकि राजस्थान भाजपा के नेता हमेशा कहते हैं कि वसुंधरा राजे उनकी सम्मानीय नेता हैं, लेकिन पिछले एक साल में ऐसे कई मौके आए हैं, जब लगा की कहीं न कहीं, कुछ न कुछ तो गड़बड़ है।
कर्नाटक, मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में कांग्रेस सरकारों को पलटी मारकर गिरा चुके भाजपा नेता राजस्थान में भी अपनी रणनीतिक जीत का समीकरण बनना रहे हैं। हालांकि भाजपा नेता बार-बार कह रहे हैं कि यह लड़ाई कांग्रेस की अपनी अंदरूनी लड़ाई है। अशोक गहलोत और सचिचनन पायलट के बीच वर्चस्व की लड़ाई है।
यही बात तो आज जैसलमेर में अशोक गहलोत ने भाजपा खेमे पर हमला बोल कर कही। गहलोत ने कहा है कि राजस्थान के नए-नए नेता वसुंधरा राजे को टक्कर देना चाहते हैं, मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं लेकिन उनमें इतना दम नहीं है जो वो वसुंधरा को टक्कर दें सके।
सियासी संकट के दौर से गुजर रहे गहलोत का यह बयान बहुत मायने रखता है। इस बयान में कई राजनीतिक संकेत छुप हैं। सही मायने में तो यह गहलोत द्वारा भाजपा की सबसे मजबूत नब्ज पर हाथ रखने जैसा ही है।
गहलोत और वसुंधरा बारी-बारी से मुख्यमंत्री बनते आ रहे हंै। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार 22 सालों में यह पहला ऐसा समय है, गहलोत और वसुंधरा दोनों को अपनी ही पार्टी में बैठे नेताआंे से अलग-अलग तरह की चुनौती मिल रही है। जहां एक और सचिन पायलट 18 कांग्रेस विधायकों के साथ भाजपा का साथ लेकर गहलोत सरकार को गिराने की उधेड़बुन में लगे हैं, वहीं भाजपा में सबकुछ सही नहीं चल रहा है। यहां भी वसुुंधरा राजे की राजनीतिक जमीन सरकाने की कवायद चर्चा में है।
लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि शतरंज के खेल में वजीर को साइड में करके उंट, हाथी घोड़ें और प्यादों के दम पर हमेशा बाजी नहीं जीती जाती। शतरंज में राजा, राजा ही होता है, लेकिन वजीर की ताकत को भूलकर शतरंज नहीं खेला जा सकता है।
कयास लगाए जा रहे हैं कि गहलोत सरकार के संकट के इस दौर में वसुंधरा राजे उनके लिए अखिरी तुरूप का इक्का साबित होंगी। कयास है, कुछ भी लगाए जा सकते हैं। लेकिन यह भी सच है कि वसुंधरा राजे जैसी प्रभावशाली नेता को अगर उनकी ही पार्टी में बैठे नेताआंे से चुनौती मिल रही होगी तो फिर नहीं भूलना चाहिए कि वसुंधरा राजे राजनीति की शतरंज में अभी राजा की भूमिका में नहीं तो वजीर से कम भी नहीं।

राजस्थान भाजपा को नहीं भूलना चाहिए कि यह वही अशोक गहलोत हैं, जिनकी सरकार वसुंधरा राजे के बंगला नंबर 13 को खाली कराने के हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर बैठी है। जिस तरह गहलोत सरकार के खिलाफ भाजपा नेता बयानबाजी करते थे और सचिन पायलट खामोश रहते थे। ठीक उसी तरह वसुंधरा के खिलाफ होनी वाली बयानबाजी पर गहलोत भी कभी कुछ नहीं बोलते।

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