कोरोना, पराली एवं प्रदूषण केे दमघोटू माहौल में आतिशबाजी

lalit-garg
दीपावली पर कोरोना महामारी की अनेक बंदिशों एवं हिदायतों के बावजूद जिन्दगी की चकाचैंध ने हमारे लगातार असभ्य होने को ही उजागर किया। यह असभ्यता ही है कि अदालती फैसलों एवं सरकारी अपीलों के बावजूद पटाखों पर नियंत्रण की बात खोखली साबित हुई। पराली एवं वायु प्रदूषण से दमघोटू माहौल एवं कोरोना के लगातार फैलते जाने के संकट को ताक पर रखते हुए लोगों ने घोर लापरवाही बरतते हुए न केवल स्वयं बल्कि दूसरों के जीवन को संकट में डाला। जनता ने आतिशबाजी पर नियंत्रण के कानूनी फरमानों का मखौल उड़ाते हुए रात भर पटाखे छुड़ाए। यह कैसी शासन-व्यवस्था है? यह कैसा अदालतों की अवमानना का मामला है? यह सभ्यता की निचली सीढ़ी है, जहां तनाव-ठहराव की स्थितियों के बीच हर व्यक्ति अपने आमोद-प्रमोद के लिये अपनी जड़ों एवं दायित्वों से दूर होता जा रहा है। यह कैसा समाज है जहां व्यक्ति के लिए पर्यावरण, अपना स्वास्थ्य या दूसरों की सुविधा-असुविधा का कोई अर्थ नहीं है। अर्थ है, तो सिर्फ अपने मनोरंजन का। जीवन-शैली ऐसी बन गयी है कि आदमी जीने के लिये सब कुछ करने लगा पर खुद जीने का अर्थ ही भूल गया, यही कारण है जिन्दगी विषमताओं और विसंगतियों से घिरी होकर कहीं से रोशनी की उम्मीद दिखाई नहीं देती। क्यों आदमी मृत्यु से नहीं डर रहा है? क्यों भयभीत नहीं है? लोगों में पटाखे फोड़ने के लिए एक खास तरह का हिंस्र उत्साह, अराजकता एवं अनुशासनहीनता देखी गयी।
आज कोरोना महामारी के संकटकालीन समय में देश दुख, दर्द और संवेदनहीनता के जटिल दौर से रूबरू है, समस्याएं नये-नये मुखौटे ओढ़कर डराती है, भयभीत करती है। कोरोना ने समाज में बहुत कुछ बदला है, मूल्य, विचार, जीवन-शैली, वास्तुशिल्प सब में परिवर्तन है। आदमी ने जमीं को इतनी ऊंची दीवारों से घेर कर तंगदील बना दिया कि धूप और प्रकाश तो क्या, जीवन-हवा को भी भीतर आने के लिये रास्ते ढूंढ़ने पड़ते हैं। सुविधावाद हावी है तो कृत्रिम साधन नियति बन गये हैं। चारों तरफ भय एवं डर का माहौल है। यह भय केवल कोरोना से ही नहीं, भ्रष्टाचारियों से, अपराध को मंडित करने वालों से, सत्ता का दुरुपयोग करने वालों से एवं अपने दायित्व एवं जिम्मेदारी से मुंह फैरने वाले अधिकारियों से भी है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम अब भी ऐसे मुकाम पर हैं, जहां सड़क पर बाएं चलने या सार्वजनिक जगहों पर न थूकने जैसे कर्तव्यों की याद दिलाने के लिए भी पुलिस की जरूरत पड़ती है। जो पुलिस अपने चरित्र पर अनेक दाग ओढ़े हंै, भला कैसे अपने दायित्वों का ईमानदारी एवं जिम्मेदारी से निर्वाह करेंगी। पुलिस का डंडा या सख्त कानून कभी भी इंसान को सभ्य नहीं बना सकते। अंदर से इच्छाशक्ति न हो तो कानूनों के पालन में इस दिवाली जैसी स्थिति होती है। सारे कानून-कायदों, अदालती या सरकारी आदेशों और पुलिस की कवायद के बावजूद पटाखे छूटते रहे। वैसे भी, भारत दुनिया के चुनिंदा देशों में है, जहां शायद सबसे अधिक कानून होंगे, लेकिन हम कितना कानून-पालन करने वाले समाज हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।
नरसी मेहता रचित भजन ‘‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाने रे’’ गांधीजी के जीवन का सूत्र बन गया था, लेकिन यह आज के आम लोगों का जीवनसूत्र क्यों नहीं बनता? क्यों नहीं आमजन पराये दर्द को, पराये दुःख को एवं पराये जीवन को अपना मानते? क्यों नहीं जन-जन की वेदना और संवेदनाओं से अपने तार जोड़ते? बर्फ की शिला खुद तो पिघल जाती है पर नदी के प्रवाह को रोक देती है, बाढ़ और विनाश का कारण बन जाती है। देश की स्वास्थ्य-रक्षा में आज ऐसे ही बाधक तत्व उपस्थित हैं, जो जनजीवन में आतंक एवं संशय पैदा कर उसे मौत की अंधेरी राहों मेें, निराशा और भय की लम्बी काली रात के साये में धकेल रहे हैं। कोई भी व्यक्ति, प्रसंग, अवसर अगर राष्ट्र को एक दिन के लिए ही आशावान बना देते हैं तो वह महत्वपूर्ण होते हैं। पर यहां तो चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा व्याप्त है। हमारा राष्ट्र नैतिक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक एवं व्यक्तिगत सभी क्षेत्रों में मनोबल के दिवालिएपन के कगार पर खड़ा है। और हमारा नेतृत्व गौरवशाली परम्परा, विकास और हर कोरोना खतरों से मुकाबला करने के लिए तैयार है, का नारा देकर अपनी नेकनीयत का बखान करते रहते हैं। पर उनकी नेकनीयती की वास्तविकता किसी से भी छिपी नहीं है, देश की राजधानी और उसके आसपास जिस तरह पटाखों पर लगे नियंत्रण की छीछालेदर हुई, उससे यह सहज ही जाहिर हो गया है। बात पुलिस की अक्षमता की नहीं है। उन कारणों की शिनाख्त करने की है, जिनके चलते एक आम नागरिक पर्यावरण या उसके अपने स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर मंडरा रहे खतरों के बावजूद लगातार उदासीन एवं लापरवाह क्यों होता जा रहा है।
कैसी विडम्बना है हमारे समाज की। किसी अनियमितता का पर्दाफाश करना पूर्वाग्रह माना जाता है। सत्य बोलना अहम् पालने की श्रेणी में आता है। साफगोही अव्यावहारिक है। भ्रष्टाचार को प्रश्रय नहीं देना समय को नहीं पहचानना है। आखिर नयी गढ़ी जा रही ये परिभाषाएं समाज और राष्ट्र को किन वीभत्स दिशाओं में धकेल रही है? विकासवाद की तेज आंधी के बावजूद हमारा देश, हमारा समाज तरह-तरह के बंधनों में आज भी जकड़ा हुआ है। उसमें न आत्मबल है, न नैतिक बल। सुधार की, नैतिकता की बात कोई सुनता नहीं है। दूर-दूर तक कहीं रोशनी नहीं दिख रही है। इन घनी अंधेरी रातों में हम कैसे विश्व गुरु बन पायेंगे?
नदी में गिरी बर्फ की शिला को गलना है, ठीक उसी प्रकार उन बाधक एवं असंवेदनहीन तत्वों को भी एक न एक दिन हटना है। यह स्वीकृत सत्य है कि जब कल नहीं रहा तो आज भी नहीं रहेगा। उजाला नहीं रहा तो अंधेरा भी नहीं रहेगा। जे पीर पराई जाने रे- भजन के बोल आज भी अनेक लोगों के हृदय को छूते है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हृदय को भी छू गया है तभी उन्होंने सबका साथ-सबका विकास एक विशिष्ट राष्ट्र कल्याणकारी उपक्रम जन-जन की पीड़ा को हरने के लिए प्रारंभ किया। राष्ट्र आज जिस मुकाम पर पहुंचा है, वहां खड़े होकर यह स्पष्ट महसूस किया जा सकता है कि मोदी नीतियों का हार्द ही है परायी पीर को जानना। पराया दुख, पराया दर्द समझना। परायी पीर को समझने का ही अर्थ है उस पीड़ा को, उस तकलीफ को मिटाने का जी-जान से प्रयत्न करना। इसी से एक सभ्य व्यवस्था इंसानों के बीच बनेगी जिसमें पुलिस सड़कों से पूरी तरह से अनुपस्थित हो जाएंगी और सारी नागरिक गतिविधियां बिना उसके हस्तक्षेप के चलती रहेंगी। दरअसल, एक आदर्श राज्य की अवधारणा में पुलिस, अदालतें और जेल जैसी संस्थाओं एवं स्थितियों की जरूरत न होना ही हमारे सभ्य होने का प्रमाण है। इन दुर्लभ श्रेष्ठताओं को पाने के लिये कुछेक घंटों का अभ्यास पर्याप्त नहीं होता। उसके लिये सतत पुरुषार्थ एवं संकल्प की जरूरत है।

(ललित गर्ग)
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