बहुत ताकवर होकर भी बेहद विनम्र थे बूटा सिंह

निरंजन परिहार
जयपुर। सरदार बूटा सिंह के निधन पर जालोर सिरोही की सियासत सन्न हैं, अच्छे लोगों की अंतरात्मा आहत है और उनसे जुड़े रहे जितने भी लोग हैं, उनका मन भरा हुआ है, क्योंकि बूटा सिंह का मन बहुत बड़ा था। इसीलिए मारवाड़ के इन दोनों जिलों के लोगों के मन में, जब से यहां के सांसद थे, तब से लेकर आज तक उनके लिए सम्मान जस का तस है। श्रीमति इंदिरा गांधी की अकाल मौत के बाद वे पहली बार जब लोकसभा का चुनाव लड़ने जालोर – सिरोही आए थे, तब भी केंद्र में मंत्री थे और बाद में तो खैर वे राजीव गांधी के बहुत करीबी रहे और सबसे अहम मंत्री के रूप में वे देश के गृह मंत्री के रूप में बहुत ताकतवर पद पर भी रहे। लेकिन फिर भी गर्व, घमंड या अहंकार उनको रत्ती भर भी नहीं छू पाया।
बेहद विनम्र और व्यवहारकुशल राजनेता के रूप में बूटासिंह को याद करते हुए राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि जिंदगी और राजनीति भले ही रंग बदलती रही, लेकिन बूटासिंह कभी नहीं बदले। परिहार कहते हैं कि बूटा सिंह कुल 8 बार में से चार बार जालोर सिरोही से सांसद रहे और चार प्रधानमंत्रियों इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हाराव और अटल बिहारी बाजपेयी की सरकारों में वे मंत्री रहे। राज्यसभा सांसद नीरज डांगी का कहना है कि बूटा सिंह दलितों के मसीहा के रूप में जाने जाते थे और प्रदानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में देश के राष्ट्रीय अनुसूचित जाति कमीशन के चेयरमैन के तौर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई। सांसद डांगी ने उन्हें बड़े कद का नेता बताया और अपने पिता तत्कालीन मंत्री दिनेश राय डांगी के साथ बूटा सिंह के स्नेहिल संबंधों को याद किया। मोंटेक्स पेन निर्माता उद्योगपति रमण जैन उस जमाने में सिरोही जिला युवक कांग्रेस के अध्यक्ष थे, जब बूटा सिंह वहां चुनाव लड़ने पहुंचे ते। उसी कारण दोनों में बहुत नजदीकियां रहीं। नाहर ग्रुप के चेयरमेन सुखराज जैन का भीनमाल से होना बूटासिंह से नजदीकियों का कारण रहा, तो वे नजदीकियां अंतिम सांस तक बनी रहीं। मेटल व्यवसायी रमेश जैन ‘क्वालिटी’ कहते हैं कि बूटा सिंह इतने बड़े नेता थे कि अपने ताकतवर दौर में उन्होंने कई बार कांग्रेस को बेहद मुश्किल हालात से बाहर निकाला।
कुल आठ बार देश की संसद में पहुंचनेवाले सरदार बूटा सिंह एक व्यक्ति के रूप में भी बहुत बड़े नेता थे। वे देश में दलितों के मसीहा के रूप में जाने जाते थे। सबसे खास बात यह रही कि इस इलाके के सांसद के रूप में जालोर सिरोही के दलितों के मन से उन्होंने उनके दलित होने के गौरव का अहसास कराया, तो उंची जातियों के लोगों में भी दलितों के प्रति सम्मान का भाव जगाया। वरना, जालोर सिरोही जैसे धुर सामंती और ऊंची जातियों के प्रभुत्ववाले इलाके में दलितों को कौन पूछता था। जालोर सिरोही के सांसद के रूप में वे भारत सरकार में खेल मंत्री, गृह मंत्री, कृषि मंत्री और संचार मंत्री भी रहे। सरदार बूटा सिंह दुनिया को अलविदा कह गए। वे कांग्रेस के दिग्गज नेता थे और जालोर सिरोही के अब तक के सबसे लोकप्रिय व लाडले सांसद भी। बहुत असरदार सरदार थे, और बड़े राजनेता के रूप में उनका कद बहुत बड़ा था। जालोर सिरोही जैसे सांमतशाही से समृद्ध इलाके के सामंतों में भी सरदार बूटा सिंह सर्वमान्य नेता रहे और इस इलाके में अब तक के वे सबसे सम्मानित और सर्वाधिक समय तक कांग्रेस के सांसद भी रहे। उनकी सबसे खास बात यह थी कि वे अनुसूचित जाति के होने के बावजूद जालोर और सिरोही जैसे उंची जातियों के अखंड अहंकारवाले नेताओं के भी सबसे अहम नेता बने रहे।
जालोर सिरोही में उनको विकास पुरूष के नाम से जाना जाता है और सच भी है कि उन्होंने जितना विकास करवाया, दोनों जिलों में आजादी के बाद उतने विकास कार्य कभी नहीं हुए। पंजाब के जालंधर जिले के मुस्तफापुर गांव में 21 मार्च, 1934 को जन्मे सरदार बूटा सिंह 1984 में लोकसभा चुनाव लड़ने जालोर सिरोही आए, तो उन्हें यहां इतना प्यार मिला कि फिर वे आखरी सांस तक राजस्थान के ही होकर रहे। बूटा सिंह अपने इलाके के लोगों से राजनीति के पार जाकर रिश्ते रखते थे, निभाते थे और सभी के काम भी करते थे। उनके इसी व्यवहार की वजह से जालोर सिरोही के कई लोग उनके बहुत करीबी रहे हैं। राजनेताओं का तो उनके नजदीक रहना मजबूरी भी था और जरूरत भी। लेकिन सामाजिक, शैक्षणिक, खेल, कला, लेखन, व्यवसाय आदि विभिन्न क्षेत्रों के कई सक्रिय लोग भी उनके बेहद नजदीक रहे हैं। वे 86 साल के थे और पिछले काफी समय से अस्वस्थ थे। जालोर सिरोही से उनसे मिलने दिल्ली जानेवालों को उनके घर में बहुत मान मिलता रहा।

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