पग पग चलता सूरज : आचार्य महाश्रमण

आचार्य महाश्रमण जी के 60 वे अवतरण दिवस पर विशेष
यह कथा है पुरुषार्थ की ,आत्मबल और नैतिकता के शंखनाद की , एक ऐसी अध्यात्म यात्रा की जो अहिंसा यात्रा बनकर निरंतर आज भी अनवरत जारी है जिसके चलते बालक मोहन का सम्पूर्ण कायाकल्प हुआ और देव गुरु और धर्म के प्रति अपने आपको समर्पित कर मुनि मुदित कुमार युवा मनीषी बनकर गुरुदेव तुलसी के अनन्य कृपा पात्र होकर महाश्रमण बने तत्पश्चात आचार्य महाप्रज्ञ के सक्षम उत्तराधिकारी मनोनीत हुए और युवाचार्य बने ।अपने गुरु आचार्य महाप्रज्ञ जी के देवलोक गमन के पश्चात जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्म संघ के ग्यारहवें आचार्य पद पर पदारोहण के साथ यह महामना महापुरुष अपने पुरुषार्थ और आत्मबल से अपने धर्म संघ के सिरमौर होकर अनंत कीर्ति के शिखर की अनवरत यात्रा में अग्रसर है, धवल परिधान में लिपटा यह महापुरुष अपने सार्थक जीवन के छठे दशक में प्रवेश कर रहे है ।इस अवसर अपने हृदय की तमाम गहराइयों से हार्दिक अभिनन्दन करते हुए श्रद्धा शिक्त शुभकामनाओं के साथ वंदन नमन करते हैं *वंदे गुरु वरम्*

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आचार्य महाश्रमण एक ऐसी आलोकधर्मी परंपरा का विस्तार है, जिस परंपरा को महावीर, बुद्ध, गांधी, आचार्य भिक्षु, आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ ने अतीत में आलोकित किया है। अतीत की यह आलोकधर्मी परंपरा धुंधली होने लगी, इस धुंधली होती परंपरा को आचार्य महाश्रमण एक नई दृष्टि प्रदान कर रहे हैं। यह नई दृष्टि एक नए मनुष्य का, एक नए जगत का, एक नए युग का सूत्रपात कही जा सकती है ।
वे आध्यात्मिक इन्द्रधनुष की एक अनूठी एवं सतरंगी तस्वीर हैं। उन्हें हम ऐसे बरगद के रूप में देखते हैं ,जो सम्पूर्ण मानवता को शीतलता एवं मानवीयता का अहसास कराता है । इस तरह अपनी छवि के सूत्रपात का आधार आचार्य महाश्रमण ने जहां अतीत की यादों को बनाया, वहीं उनका वर्तमान का पुरुषार्थ और भविष्य के सपने भी इसमें योगभूत बन रहे हैं। विशेषतः उनकी विनम्रता और समर्पणभाव उनकी आध्यात्मिकता को ऊंचाई प्रदान कर रहे हैं। भगवान राम के प्रति हनुमान की जैसी भक्ति और समर्पण रहा है, वैसा ही समर्पण आचार्य महाश्रमण का अपने गुरु आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ के प्रति रहा है।
आचार्य महाश्रमण जी से मेरी सर्वप्रथम मुलाकात जैन विश्व भारतीय परिसर लाडनू में गुरुदेव आचार्य तुलसी के सानिध्य में हुई, जब हम आचार्य श्री के दर्शनार्थ सपरिवार लाडनू गये।माता पिता भी साथ थे । भारतीय जीवन बीमा निगम में विकास अधिकारी के पद पर नियुक्ति के पश्चात आचार्य श्री के दर्शन का प्रथम अवसर था और अवसर भी विशेष था ।स्वयं गुरुदेव आचार्य श्री के जन्म दिवस पर उनकी जन्म भूमि लाडनू के जैन विश्व भारती परिसर में आचार्य तुलसी युवाचार्य महाप्रज्ञ और साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा जी के साथ भावी आचार्य महाश्रमण जी जो उस समय अल्पव्यस्क बालक मुनि मुदित कुमार थे, कोई 12- 15 वर्ष की अवस्था रही होगी,वर्तमान आचार्य श्री महाश्रमण जी की सबके एकसाथ दर्शन वंदन के गुरु धारणा ग्रहण करने का गुरु कुल वास में । धर्म संघ के सिरमौर आचार्य,युवाचार्य ,साध्वी प्रमुखा जी के साथ भविष्य की संभावना के महाश्रमण मुनि मुदित कुमार जी एवं तत्रविराजित चरित्रात्माओं एक साथ दर्शन वंदन का वह सुअवसर जीवन भर के लिए याद गार बन गया । आचार्य तुलसी महान स्वप्न दृष्टा और कला पारखी थे,उन्होंने मुदित मुनि की सुप्त प्रतिभा को पहचान कर अपने सानिध्य में उन्हें अपने हाथों गढ़कर मुनि मुदित कुमार को महाश्रमण बना दिया । बहुत विलक्षण है महाश्रमण जी का समर्पण भाव । वे श्रद्धा और समर्पण की अंगुली पकड़कर गुरु की पहरेदारी में कदम-दर-कदम यूं चले कि जमीं पर रखा हर कदम पदचिह्न बन गया। सरस्वती के ज्ञान मंदिर में ऐसा महायज्ञ शुरू किया कि साधना आराधना स्वयं ऋचाएं बन गईं। जिज्ञासा से मानो अतीन्द्रिय ज्ञान पैदा हो गया। आत्मविश्वास के ऊंचे शिखर पर खड़े होकर वे सभी खतरों को चुनौती दे रहे हैं । न उनसे डरे, न उनके सामने कभी झुके और न ही उनसे पलायन किया। इसीलिए हर असंभव कार्य आपकी शुरुआत के साथ संभव होता चला गया। तेरापंथ धर्मसंघ के विकास के खुलते क्षितिज इसके प्रमाण हैं। आपने कभी स्वयं में कार्यक्षमता का अभाव नहीं देखा। क्यों, कैसे, कब, कहां जैसे प्रश्न कभी सामने आए ही नहीं। हर प्रयत्न परिणाम बन जाता कार्य की पूर्णता का। इसीलिए जीवन वृत्त कहता है कि गुरु तुलसी और गुरु महाप्रज्ञ संकल्प देते गए और शिष्य महाश्रमण उन्हें साधना में ढालते गये ।
मेरा यह सौभाग्य रहा कि मुझे गुरुदेव आचार्य तुलसी के साथ युवाचार्य के रुप महाप्रज्ञ जी और महाश्रमण जी दोनों की कृपा दृष्टि एवं निकट सानिध्य और भेंटवार्ता और साक्षात्कार का सुअवसर एवं धर्म संघ के तीन तीन आचार्य और साध्वी प्रमुखा जी की असीम अनुकम्पा भी मेरी झोली में सहज उपलब्ध रही , उसके लिए विनम्रता पूर्वक अपने सौभाग्य को स्वीकार कर सविनय नतमस्तक होकर वर्तमान आचार्य महामना महाश्रमण जी को 60 वे अवतरण दिवस पर तहेदिल से भावभीनी वंदना सहित दिल की गहराई से श्रद्धा शिक्त शुभकामनाएं प्रकट करने का सुअवसर भी हाथ से जाने नहीं देना चाहता कि वे नित नई उंचाईयों को छूकर नैतिकता का जयघोष के साथ अहिंसा यात्रा में निरंतर अग्रसर रहकर अनंत आस्था धवल कीर्ति के सोपान तय करते रहे । *वंदे गुरुवरम्*

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