
बीते दिनों मुझे जबरिया लादकर नजदीकी सी.एच.सी. पर ले जाया गया। वहाँ कोविड-19 से बचाव के लिए टीकाकरण कराया गया। हुआ यूं कि परिवार के सभी लोगों ने समय पर एक जागरूक नागरिक की तरह कोरोना की भयावहता को देखते हुए वैक्सीनेशन करवा लिया था। घर में मैं ही एक ऐसा बुजुर्ग सदस्य बचा था, जिसने उनकी निगाह में लापरवाही के चलते टीकाकरण नहीं कराया था। हर कोई यही कहता कि जाओ टीका लगवा लो……..जाओ टीका लगवा लो……..जाओ टीका लगवा लो……..गोया मेरा वैक्सीनेशन न होने से कोरोना का वायरस जो मुझमे है वह इन पर अटैक कर देगा।
कहने में क्या जाता है। सभी लोग तो फोर व्हीलर, टू व्हीलर में बैठकर वैक्सीनेशन सेन्टरों पर पहुँचकर टीकाकरण करवा लिये। मैं संसाधन विहीन होने की वजह से किसी सहयोगी का इन्तजार करता रहा। बहुतों से दूरभाषीय सम्पर्क कर अपनी प्रॉब्लम बताई उन सभी ने मुझे अपने तर्कों के माध्यम से मुझे टरका दिया। मुझे समझ में आ गया कि इन सभी के लिए मेरा कोई इम्पॉरटेन्स नहीं है। इसी बीच लेटे-लेटे मुझे एक युवा शिष्य की याद आई। उसको फोन किया। बिना किसी ना-नुकुर के वह तूफानी बरसात की बौछारें झेलता हुआ बाइक से मेरी स्टडी तक आ गया। और बोला बाबा जी मैंने वेबसाइट पर आपका पंजीयन भी करवा लिया है चलिए सी.एच.सी. पर आपका वैक्सीनेशन करवा दें। मैं एक आज्ञाकारी की तरह उसकी बाइक के पीछे बैठकर कुछ ही पलों में सी.एच.सी. पहुँच गया। फिर………….
वहाँ टीकाकरण कक्ष में बैठी महिला स्वास्थ्य कर्मियों से युवा पत्रकार ने हमारे पहुँचने का उद्देश्य बताया। महिला स्वास्थ्य कर्मियों ने कहा आइए बाबा जी बैठिये। बस चन्द ही पलों में आपको टीका लग जायेगा। इतना कहकर उसने मुझे एक स्टूल दिखाते हुए कहा बाबा जी इस पर बैठ जाइये। चूंकि टीका लगवाना था इसलिए मैं उसके बार-बार बाबा शब्द के उच्चारण को मन मसोसकर सुनता रहा। गौर वर्णीय महिला स्वास्थ्य कर्मी जिसने अपने मुँह पर मास्क लगा रखा था, द्वारा बाबा शब्द के उच्चारण मात्र से ही मेरे अन्दर का गुस्सा जाग उठा। चेहरा तमतमा गया………इसके बाद बहुत कुछ सोच-विचार कर मैंने अपनी पुरानी हरकतों को रोका। साथ गया युवा सहयोगी मेरी मनोदशा को भाप रहा था। टीका लगने के उपरान्त मेरा हाथ पकड़कर उसने सहारा दिया, और सी.एच.सी. के बाहर लेकर आया। बात लम्बी न बढ़ाऊँ संक्षिप्त में जानिये कि मेरे अन्दर का 25 साल पहले का सोया जवान पुरूष जाग गया था। मैंने अपने उम्र को धिक्कारा। गंजी हुई खोपड़ी और बचे-खुले सफेद बालों के प्रति भला-बुरा कहा। ऊपर से नजर के चश्मे को गालियां दीं। इन सबके बावजूद मुझे बरबस कवि केशवदास याद आने लगे। उन्होंने अपनी दुर्दशा पर जो खाका खींचा था- ठीक उसी अन्दाज में उनकी रचना मुझपर भी लागू हो रही थी।
केशवदास ने लिखा है कि- केशव केशन अस करी, जस अरिहुँ न करांय। चन्द्रबदन, मृगलोचनी बाबा कहि-कहि जायं।। तो ये था मेरे सदमे का कारण।
– डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
वरिष्ठ नागरिक/पत्रकार/स्तम्भकार
अकबरपुर, अम्बेडकरनगर (उ.प्र.)
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