भारत में प्रत्येक 3.5 मिनट में एक व्यक्ति की मृत्यु सड़क हादसे में हो जाती है. अभी कुछ हीं समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान कहा था कि देश में उतने लोग सीमा पर युद्धों में या आतंकी हमलों में नहीं मारे जाते जितने सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं. बात अगर वाहनों के संख्या की करें तो हमारे देश में दुनिया के केवल एक फीसदी वाहन मौजूद हैं जबकि सड़क दुर्घटना से होने वाली मौतों में भारत का हिस्सा 11 प्रतिशत है, यह एक बेहद हीं चौकाने वाली बात है. देखा जाए तो सबसे ज्यादा हादसे वाहन चालकों की गलतियों और लापरवाहियों एवं नियम कायदों की अनदेखी करने के कारण होते हैं. इनमें भी बहुत छोटी छोटी सी भूलें हैं जिनपर ध्यान देने से सड़क दुर्घटनाओं को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है. वाहनों की तेज गति, यातायात नियमों का उल्लंघन, टूटी फूटी सड़कें, वाहनों की भीड़, चालक का नशे में होना के अलावा पैदल यात्रियों की लापरवाही भी सड़क हादसों के लिए जिम्मेवार है. एक और बहुत गौर करने वाली बात ये है कि हमारे यहाँ लोग पता नहीं क्यों इतनी जल्दी में होते हैं. सड़कों पर हर किसी को दूसरे से पहले निकल जाने की जल्दी होती है. इस प्रयास में वे सभी सड़क नियमों को ताक पर रख कर अपनी मंशा पूरी करने की कोशिश में सड़क पर हीं गाली गलौंच से लेकर जाम तक लगा देने में भी कोई परहेज नहीं करते. इन सब के बीच सबसे बुरी हालत पैदल यात्रियों की होती है. भीड़ भाड़ वाली जगहों से लेकर राजमार्ग तक कहीं भी उनको त्राण नहीं मिलता. सड़क पार करते हुए कब किधर से कोई गाड़ी सर्र से उन्हें कुचलते हुए निकल जाए कुछ पता नहीं. अमेरिका समेत सभी विकसित देशों में हर चौराहे पर पैदल यात्रियों की सड़क पार करने की सुविधा को ध्यान में रखते हुए बेग बटन की सहूलियत प्रदान की गयी है. जहाँ खड़े होकर पैदल यात्री अपनी वांछित दिशा की ओर बटन दबाते हैं और सड़क की ट्रैफिक लाईट रेड हो जाती है. सभी वाहन चालक तब तक पूर्ण धैर्य के साथ वहाँ इंतज़ार करते हैं जबतक कि पैदल यात्री आराम से सड़क पार न कर लेते. पर हमारे यहाँ अधिकतम भीड़ वाली व्यस्त सड़कों पर भी ऐसी सुविधा नहीं मिलती. जबकि भारत जैसे जल्दबाज देशों में ऐसे बटनों का होना ज्यादा जरुरी है, जहाँ के असंवेदनशील लोगों को किसी जरूरतमंद यहाँ तक कि नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए भी दो मिनट रूक जाना गवारा नहीं. उनकी नज़रों में ज्यादातर पैदल यात्री गरीब होते हैं जो वाहन अफोर्ड नहीं कर सकते इसलिए इनकी नज़रों में ये इज्ज़तदार लोग नहीं हो सकते जिन पर अपना वक़्त खराब किया जाए. इस चक्कर में पैदल यात्री खड़ी गाड़ियों के सामने से, दौड़ कर या जल्दबाजी में सड़क पार करने की कोशिश में वाहनों की चपेट में आकर मारे जाते हैं. प्रेशर हॉर्न, सायरन या अचानक से चौंकाने वाले तेज हॉर्न भी ऐसे हादसों के लिए कम जिम्मेवार नहीं हैं. देश में सड़क हादसे के आंकड़ों को देखते हुए सरकार की तरफ से बेग बटन की सुविधा, तेज हॉर्न पर नियन्त्रण, सायकिल चालन को प्रोत्साहन समेत इस दिशा में अन्य छोटे छोटे प्रयास भी निश्चय हीं बेहद कारगर सिद्ध होंगे.
सड़क हादसों से बुरी तरह आक्रान्त इस देश में रोड एक्सीडेंट्स को कम करने के साथ हीं महामारी काल में स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सायकिल का उपयोग करना एक बेहतर ऑप्शन हो सकता है. जापान, नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम आदि उन्नत देशों में सायकिलिंग को बहुत तेजी से अपनाया और बढ़ावा दिया जा रहा है, परन्तु भारत जैसे दिखावा परस्त देश में ये युक्ति भी कारगर होना नामुमकिन सा लगता है, जबकि महामारी को देखते हुए भीड़भाड़ वाली बसों और मेट्रो ट्रेनों की अपेक्षा सायकिल एक सुरक्षित उपाय है. न सिर्फ़ महामारी से सुरक्षा बल्कि सेहत के लिहाज़ से भी सायकिल चलाना एक उपयोगी एक्सरसाईज है. इससे न केवल वजन नियन्त्रित रहता है बल्कि यह मांसपेशियों को भी सुदृढ़ बनाता है, जिससे इम्यूनिटी स्ट्रोंग होती है. ईंधन की खपत और प्रदुषण कम होने से देश का पर्यावरण शुद्ध और सुन्दर होगा तथा देश की आर्थिक स्थिति उन्नत होगी सो अलग. परन्तु हमारे यहाँ तो सायकिल गरीबों की सवारी मानी जाती है सो भले हीं मोटापे और तोंद की वजह से उठना बैठना मुश्किल हो जाए पर सायकिल को लोग हाथ नहीं लगाएँगे.
अंत में इतना हीं कि 31 से दिल्ली में लॉकडाउन खुल रहा है. जैसे जैसे कोरोना नियंत्रित होगा अन्य शहरों में भी लॉकडाउन खुल जाएँगे और इसी के साथ सड़क हादसों का दौर भी प्रारम्भ हो जाएगा. अतः प्रत्येक देशवासी से गुज़ारिश है कि थोड़ा धैर्य, थोड़ी सम्वेदनशीलता और थोड़ी सी सावधानी अपना कर अपना और दूसरों का ख्याल रखें. जहाँ तक हो सके सायकिल और पैदल चलने को वरीयता दें ताकि कम ईंधन खर्च तथा अच्छे स्वास्थ के साथ-साथ महामारी और सड़क हादसों से भी समुचित बचाव हो सके. मास्क लगाएँ, निर्धारित दूरी नियम का पालन करें, कोरोना से देश को और अपने आप को मुक्त रखने का प्रयास करें.
– कंचन पाठक.
ग्रेटर कैलाश, नई दिल्ली.
परिचय –
नाम – कंचन पाठक
जन्म – 11 फ़रवरी
शिक्षा – कानून, प्राणिविज्ञान और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से स्नातकोत्तर
प्रकाशन – सरिता, कादम्बिनी, अहा ज़िन्दगी, सरस सलिल, कथाक्रम, राजभाषा भारती (गृहमंत्रालय की पत्रिका), समाज कल्याण (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय), मधुमती (राजस्थान साहित्य अकादमी), अट्टहास, स्पंदन, रूपायन आदि पत्रिकाओं में कविताएँ, आलेख, व्यंग्य समेत दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान टाइम्स, अमर उजाला, हमारा मेट्रो, डेल्ही टाइम्स, दैनिक भास्कर, जनसंदेश (मध्यप्रदेश) आदि सौ से अधिक पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित .. विभिन्न वेब पत्रिकाओं और ब्लॉग में लेखन
पुस्तक – इक कली थी (एकल), सिर्फ़ तुम, पुष्पगंधा, काव्यशाला, कविता अनवरत (संयुक्त) इत्यादि
संपादन – कस्तूरी कंचन, आगमन आदि
सम्मान – ठाकुर प्रसाद सिंह स्मृति सम्मान (लखनऊ), आरसी प्रसाद सिंह सम्मान (बिहार), आगमन साहित्य, तेजस्विनी (दिल्ली), मिथिला महोत्सव सम्मान (बिहार), हिजला मेला महोत्सव सम्मान (झारखण्ड) इत्यादि
संपर्क –
कंचन पाठक
द्वारा विनोद कुमार
जॉइंट कमिश्नर कमर्शियल टैक्सेज,
कमर्शियल टैक्सेज ऑफिस
मधुबनी सर्किल
खादी भण्डार रोड
मधुबनी – 847211