गलती से मुझे मिल गई पनीर की पकौड़ी….

डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
मुझे कल ही पता चला कि मैं घर-परिवार के लिए अवांछनीय हो गया हूँ। या ये कहिए कि बच्चे से लेकर सयाने तक की जेहन में मुझको लेकर यही है कि कब मैं इस स्वर्णिम काल यानि कोरोना काल में परलोक गमन करूँ, और मकान का 240 वर्गफुट स्थान पर वह लोग काबिज हो जायें। जी हाँ! मैं जिस कमरे में रहता हूँ उसका क्षेत्रफल 240 वर्गफुट है। भवन का निर्माण मेरे द्वारा लगभग आधी सदी पूर्व कराया गया था। इसी अधिकार से मैं अपने द्वारा निर्मित मकान के उतने हिस्से में रहकर लेखन कार्य करता हूँ।
नस्ल बदली है। बदले भी क्यों न। 3 पीढ़ियों का अन्तर है। ऐसे में मैं इस पीढ़ी युद्ध में अपनी समझ से एक मात्र बचा हुआ योद्धा हूँ। ऐसा योद्धा जो अपनी सभी पीढ़ियों के लिए भार बन गया हो। यह आलेख आपके सामने प्रस्तुत करते हुए मुझे कुछ अतिरिक्त बातें आपको बतानी हैं मसलन- मांसाहार से बेहतर होता है शाकाहार और शाकाहार में दूध व दूध से निर्मित सभी खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होते हैं। इनके सेवन से शरीर में इम्यूनिटी बढ़ती है। प्रतिरोधक क्षमता क्षीण नहीं होती…….आदि……आदि……आदि।
पत्नी की पाकशाला यानि रसोई घर से एक प्लेट में मुझे कुछ पकौड़ियाँ भेजी गईं। वाहक का काम दोनों पोतियों ने संभाल रखा था।
मैं चश्मा लगाकर उन पकौड़ियों का स्वाद चख रहा था। इसी बीच एक अत्यन्त छोटी पकौड़ी मुँह में पड़ी। लगा कि यह प्याज और आलू, बेसन से कुछ भिन्न है। मैंने पोती से पूछा कि छोटी पकौड़ी जिसका वजन बमुश्किल 5 ग्राम रहा होगा किस चीज की है। तो उसने तपाक से उत्तर दिया कि पनीर की। उसने आगे कहा कि पनीर इज माई फेवरिट…….आई लाइक एण्ड लव पनीर………..। मेरे पापा पनीर के शौकीन हैं। प्रायः वह मार्केट से खरीदकर पनीर लाते हैं। उनके लिए सब्जी और हम सबके लिए पनीर के पराठे बनते रहते हैं। आपके लिए एक और ले आऊँ।
पोती के इस सवाल पर मैंने कहा कि पनीर महंगा है, इसलिए तौल में कम आया होगा। रहने दो, एक पकौड़ी से ही काम चला लूंगा। मैंने उससे कहा बेटा यह पकौड़ी भी तुम्हारी दादी के दृष्टिदोष की वजह से गलती से मेरे प्लेट में आ गई होगी। वरना उन्हे क्या पड़ी है जो निठल्ले पति की इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए पनीर की पकौड़ी खिलायें। ठीक ही तो करती हैं वो, उनका भी बुढ़ापा है। पता नहीं कब पति परलोक गामी हो जाये यदि ऐसा होता है तो पुत्र ही एक मात्र उनकी नैय्या का खेवनहार होगा। यही कारण है कि मुझ बुड्ढे को उतना तवज्जो उनके द्वारा नहीं दी जाती है। मेरी बात सुनकर वह कुछ नहीं बोली बस इतना कहा कि एक और लेना हो तो बोलो। मैं किचेन में से ले आऊँगी। वह खामोश होकर बैठ गई थी। प्याज, बेसन, आलू की पकौड़ी खाते-खाते मैंने यूं ही बात छेड़ा था कि……………पोती डार्लिंग तुम लोग भाग्यशाली हो कि तुम्हारे पापा जिन्दा हैं, इसलिए तुम लोग जो भी फरमाइश करती हो वह पूरी हो जाती है। मेरे पिता जी यानि पापा को परलोकगमन किये 45 साल से ऊपर हो गया। मैं अनाथ सा होकर जीवन बिता रहा हूँ। पोती ने तत्काल कहा- बाबा मेरे पापा तो आपके बेटे हैं। वह आपकी इच्छा पूरी करेंगे। उत्तर दिया, बेटा इस समय घोर कलयुग चल रहा है। साथ ही वैश्विक महामारी कोरोना का प्रकोप जारी है। ऐसे में सभी रिश्ते बेमानी से होकर रह गये हैं।
अभी बीते दिनों एक सज्जन की मौत हो गई। कोरोना का खौफ इतना था कि परिजनों ने उन्हें अपना पति व पिता मानने से इंकार कर दिया। यह तो अच्छा था कि कुछ युवा समाजसेवियों ने उनका दाह-संस्कार धर्म के अनुसार किया। दाह-संस्कार करने वालों ने जब मृतक के पुत्र से उनका सम्बन्ध पूछा तो पुत्र ने जवाब दिया कि यह मेरे पड़ोसी हैं। इनके आगे-पीछे कोई नहीं है। आप इन्हें ले जाइये, इनके शव का अन्तिम संस्कार करिये। छोटी पोती यह सब सुनती रही। इसी बीच मेरे प्लेट में एक पनीर पकौड़ी और आ गई। मैं यह नही समझ पाया था कि यह चमत्कार कैसे हुआ। पूछने पर छोटी पोती ने बताया कि वह ही किचन से पनीर पकौड़ी का एक और पीस ले आई थी। मैं पकौड़ी खाता रहा। अपनी बढ़ती उम्र, जर्जर अर्थव्यवस्था, कोरोना काल और बेमानी होते रिश्तों के बारे में सोचने लगा। अन्त में मैंने पोती को पनीर की पकौड़ी खिलाने के लिए धन्यवाद बोला।

– डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
वरिष्ठ नागरिक/पत्रकार/स्तम्भकार
अकबरपुर, अम्बेडकरनगर (उ.प्र.)
9454908400, 9125977768

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