लघुकथा- पेड़ का पेड़ होना

रास बिहारी गौड़
वह एक पेड़ था। सड़क किनारे खड़ा था ।
जब हवा धीरे बहती तो वह दबे कदमों से हर बहाव का पीछा करता..। जब हवा तेज चलती तो वह तेज कदमों से बिरजू महाराज सा नृत्य करता। जब हवा में आँधी तूफान का आक्रोश बोलता तो वह शिव बन पृथ्वी के भाल पर तांड़व करता ..तब तक करता जब तक कि तूफ़ान हवा की तरलता में वापिस नहीं घुल जाता।
हवा जब बिल्कुल नहीं चलती तब वह वैचारिक उदासी ओढ़ नीचे बिछी जमीन से बतियाता-कभी उसे अपने दर्द बताता.. ,कभी उसे अपने डर खोलकर दिखाता.,तो कभी उसकी गोद मे बैठकर चुपचाप कोरी आँखों से शून्य में ताकता रहता..।
वह अपने कच्चे-पक्के फल जान -बूझ कर जमीन पर बिखेर देता..ताकि बेजुबान की जुबानों तक अपना स्वाद पहुँचा सके। बच्चे पत्थर से निशाना लगाते, वह उनके साथ आँख-मिचौनी खेलता- निशाना लग जाता तो बच्चों की हँसी के साथ हँसता.., निशाना चूक जाता तो झूठ-मूठ अपनी शाख हिलाकर चिढ़ाता.. । वह बच्चों के साथ बचपन, जवानी, बुढापा एक साथ जी लेता था।
उसके नीचे बैठ कर यौवन-युगल, सृजन-स्वप्न सजाता तो वह मुलायम शाख पर उगी बिल्कुल ताजी कोंपल उनकी गोद मे डाल देता..,सृष्टि का सत बरसाता..।
वह उस दिन बहुत खुश होता जब मंगल-गीत गाती औरतें उसके चारों ओर लाल-धागा बाँधकर कोई मन्नत माँगती. ..। उसे लगता दुनिया की हर स्त्री, पुरुष-परमेश्वर के सापेक्ष, उसे अपना रक्षक नामित कर रही है..। वह पुरुष होकर प्रकृति का रक्षण करता..।
पैदल चलने वाली हर थकान के लिए छाँव बचाकर रखता..। उनींदी आँखों को नींद ..उम्र को सीख..थकान को अरण्य..ठंडे चूल्हों को आग….वह हर खुली झोली को कुछ ना कुछ जरूर देता..।
वह चिता के लिए लकड़ियां देते हुए आग, हवा, आकाश, मिट्टी में उसी तरह मिल जाता जैसे दावानल में अग्नि, नदी में नीर, धरती में माटी और शून्य में उजाला…।
वह पेड़ का पेड़ होना, अपने अंकुर के साथ, हर वक्त जिंदा रखता था..।

*रास बिहारी गौड़*

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