ईर्ष्या ही है जीवन को नारकीय बनाने की जन्मदात्री पार्ट 1

j k garg
जीवन में अनेकों मोकों पर हमारे मन में ईर्ष्या की भावना बलवती हो ही जाती है | आईये जरा आत्मचिंतन करें और जानने की कोशिश करें की मन में ईर्ष्या का वायरस क्यों पनपता है और केसे यह वायरस धीमे धीमे हमारे जीवन को नारकीय बना डालता है | ईर्ष्यालु प्रवर्ती की वजह से स्वजन आत्मीयजन मित्र और सहकर्मी ईर्ष्या ग्रस्त आदमी से कतराने लगते है जिससे उसे खुद से आत्मग्लानी हो जाती है और निसंदेह ईर्ष्यालु आदमी हमेशा चिडचिडा और खिन्न रहता है | सच्चाई तो यही है कि असीमित इच्छाओं के साथ हमारा लगाव ही हमारे मन के अन्दर ईर्ष्या प्रवेश करने की इजाजत देता है और हमें सभी तरह की मुश्किलों एवं परेशानियों के मायाजाल में फसा डालता है | ईर्ष्या तब भी पैदा होती है, जब किसी महत्वपूर्ण रिश्ते को किसी दूसरे व्यक्ति से खतरा महसूस हो। कभीकभार संपन्नता की चाह एवं अवांछित स्पर्द्धात्मक स्थितियां भी ईर्ष्या पैदा करने का कारण बन जाती है |
डा. जे. के. गर्ग
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