j k gargउन स्थितीयों को जानना जरूरी है जब मन में ईर्ष्या-डाह का जन्म होता है | ईर्ष्या का बीजारोपण होता जब कतिपय वस्तुयें अथवा सुख सुविधा एवं सम्पन्नता के तथाकथित साधन हमारे अपने पास तो नहीं हों किन्तु वैसी ही सुख सुविधाओं के साधन पास पड़ोसियों के पास मोजूद हों | ध्यान रक्खें कि चीजों, व्यक्तियों और जगहों से अनुचित लगाव भी हमारे मन में उनके खोने का भय पैदा करता है और यही भय मन में ईर्ष्या के पोधे को पनपाकर उसे विशाल पेड़ बना देता । सच्चाई तो यह भी है कि असीमित इच्छाओं के साथ हमारा लगाव ही परेशानियां पैदा करता है । ईर्ष्या तब भी पैदा होती है, जब किसी महत्वपूर्ण रिश्ते को किसी दूसरे व्यक्ति से खतरा महसूस हो।
ईर्ष्या की भावना को मिटाने का प्रभावशाली तरीका अपनी उपलब्धियों और लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना है क्योंकि अपने लक्ष्यों पर अपनी उर्जा और ध्यान को केन्द्रित करने से आपके मन में उपजी असुरक्षा की भावना स्वत ही धीमें धीमें दूर होती जाती है | यह भी सच्चाई हमें ध्यान में रखनी होगी कि बचपन में तो कुछ भी पाने के लिए रोना ही काफी होता था। लेकिन युवा और बड़े होने के बाद हमें अपनी चाहत और लक्ष्य प्राप्त करने के लिए त्याग करने, अनुशासित होने और जोखिम लेने को तैयार रह कर सम्पूर्ण निष्ठा के साथ प्रयत्न करते रहने होगें वरना मन में ईर्ष्या पैदा होती रहेगी |