*राजनीति व मनमानी के अड्डे बनते विश्वविद्यालय*

-एमडीएसयू में सिंह व थानवी की कार्यशैली से कुछ ऐसा ही आभास हुआ
-थानवी की छुट्टी, ’’फूट डालो, राज करो’’ की नीति पर चले
-ऐसे बीज बो गए, जिसकी फसल वर्षों तक लोगों को काटनी पड़ेगी

✍️प्रेम आनन्दकर, अजमेर।
👉कोई भी विश्वविद्यालय शिक्षा का परिसर होता है, राजनीति या अपनी मनमानी करने का अड्डा नहीं। पिछले दो कुलपतियों की कार्यशैली ने अजमेर के महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय (एमडीएसयू) को कुछ इसी तरह बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। पहले यहां स्थाई कुलपति प्रो. आर.पी. सिंह और उनके बाद कार्यवाहक कुलपति बनाए गए ओम थानवी की कार्यशैली से यही लगा कि विश्वविद्यालय राजनीति व मनमानी के अड्डे बनते जा रहे हैं। प्रो. सिंह घूसकांड में आरोपी हैं, इसलिए राज्यपाल व कुलाधिपति कलराज मिश्र ने उन्हें पहले निलंबित और फिर बर्खास्त कर दिया था। इसके बाद हरिदेव जोशी पत्रकारिता व जनसंचार विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति ओम थानवी को एमडीएसयू का कार्यवाहक कुलपति बनाया गया। प्रो. सिंह भाजपाई विचारधारा थे, इसलिए उनकी नियुक्ति पूर्व राज्यपाल कल्याणसिंह ने की थी। थानवी कांग्रेसी विचारधारा के हैं। किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़े होने का कोई बुरी बात नहीं है, क्योंकि जब हम वोट देते हैं, तो इसी विचारधारा के आधार पर देते हैं। लेकिन जब हम किसी संस्था के मुखिया के पद पर आसीन हो जाते हैं, तो विचारधारा पीछे छूट जाती है। वैसे भी किसी आयोग में अध्यक्ष व सदस्य और विश्वविद्यालय में कुलपति के पद संवैधानिक होते हैं। बोर्डों व निगमों में भी अध्यक्ष व सदस्य के पदों पर आसीन व्यक्तियों को राजनीतिक विचारधारा से अलग हटकर काम करना चाहिए। लेकिन यहां तो थानवी पूरी तरह राजनीतिक विचारधारा के रंग कर काम कर रहे थे। हमारी पत्रकारिता जमात के साथी भाई ओम थानवी अभी हरिदेव जोशी पत्रकारिता व जनसंचार विश्वविद्यालय के स्थाई कुलपति हैं, इसलिए पत्रकारिता के साथी होने के नाते मेरी उन्हें सलाह है कि वे राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर काम करें।

प्रेम आनंदकर
जो लोग कुलपति के रूप में थानवी की शैक्षिक योग्यता पर सवाल खड़े करते हैं, उनको यह बताना लाजिमी है कि प्रोफेशनल कोर्सेज वाले विश्वविद्यालय के कुलपति और शिक्षकों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की गाइड लाइन के अनुसार पी.एचडी. होना जरूरी नहीं है, बल्कि संबंधित फील्ड में 25-30 साल या इससे अधिक अनुभवी व्यक्ति को नियुक्त किया जा सकता है। हो सकता है कि इसी गाइड लाइन को देखते हुए राज्य सरकार ने थानवी को हरिदेव जोशी पत्रकारिता व जनसंचार विश्वविद्यालय का कुलपति बनाने की सिफारिश राज्यपाल से की थी। भाई थानवी जी, आप सत्ता का सुख भोगें, हमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हम मनमानी करने लगें। आपने तो अपनी कुर्सी बचाए रखने के चक्कर में सरकार और कतिपय नेताओं की खुशामद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शायद आपको यह आभास नहीं हो पाएगा कि ’’फूट डालो, राज करो’’’ की नीति अपनाते हुए आप जो बीज बो कर गए हैं, उसकी फसल कई वर्षों तक यहां के शिक्षकों, अधिकारियों और कर्मचारियों को काटनी पड़ेगी। जितना समय आपने इन सब फिजूल बातों और कार्यों में लगाया, उतना समय यदि सकारात्मक कार्यों में लगाते तो एमडीएसयू को कुछ नया स्वरूप दे जाते। आपको एमडीएसयू का आखिरी राम-राम।

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