नवसंवत्सर ! (कविता)

सुनील कुमार महला
भीनी-भीनी गंध खिली है
अवनि-अंबर से मिली है
पुरवाई से पुरवाई आन मिली है
धूप-दीप और बाती
नवसंवत्सर भारत की है थाती

आओ आओ
बांधे हर द्वार पर बंदनवार
आया खुशियों का चैत्र नवरात्र त्योहार
आम्र में बौर खिले हैं, वासंती सौगात
कोयलिया की कूक जीवन रही संवार

जीवन रस घोल रहे हैं
मधुमक्खियों, भौंरों और तितलियों ने छेड़ी है तान
प्रार्थना के स्वर हैं
खुश आज सारा जहान
आया प्यारा खुशनुमा ये विहान

आओ आओ रंगोली काढ़े
भक्ति के भाव आज हैं गाढ़े
लाल चुनरिया ओढ़ें
हर आत्मा-मन, हर लब खुशियों को घोलें
उन्नयन, संवर्द्धन के प्रति संकल्पबद्ध हो लें

खुशियों के ताबीज़ हैं बिखरे
रंगोली के रंग हैं आज निखरे
घर-आंगन दहलीज़
व्यंजनों की बहार है
कहीं गुड़ी-पड़वा, कहीं चेटीचंड त्योहार है

वर्ष प्रतिपदा आई, हो गया सृष्टि प्रारंभ
मधुमास की महक अनोखी, अद्भुत
नौरोज, पोंगल, पोएला बैशाख
कलश स्थापना, दुर्गा मां पूजन
संस्कृति अपनी पुरातन, सनातन

सरसों, गेहूँ खेतों में चमके
खूब सुनहरा रूप
आज धरती का दामन है दमके
खुश है कृषक ,खुश है मजदूर
धन-धान्य धरती धानी धमके

कंठ-कंठ है स्वर लहरियां
आंखों में दीप असंख्य है उज्ज्वल
रोली अक्षत चावल और पान
चढ़ाएं सुपारी फूल नारियल
चैत्र में प्रज्ज्वलित नवरात्र खुशियां प्रतिपल।

सुनील कुमार महला,
स्वतंत्र लेखक व युवा साहित्यकार
ई मेल [email protected]

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