*आरएसएस प्रमुख की नसीहत क्या भाजपा के लिए मायने रखेगी*

*दोनों के बीच दूरियां मोदी सरकार बनने के बाद बढ़ी है,चुनाव में भी जमीन पर सक्रिय नहीं दिखा था संघ*
*क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वाकई में अपने अनुशांगिक राजनीतिक संगठन भारतीय जनता पार्टी से नाराज है? क्या वाकई संघ ने लोकसभा चुनाव में हमेशा की तरह भाजपा के लिए जमीन पर खुलकर कार्य नहीं किया ओर इसी कारण वह बहुमत से दूर रह गई? क्या भाजपा के अध्यक्ष जेपी नड्डा के उस बयान ने इन संबंधों को बिगाड़ने में आग में घी का काम किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा को अब संघ की जरूरत नहीं है?*

ओम माथुर
*ये सवाल इसलिए, क्योंकि कल नागपुर में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग कार्यक्रम में जो कुछ कहा,वह अपरोक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पर चलाए गए तीर थे। अहंकार, झूठ, चुनावी युद्ध, विपक्ष नहीं प्रतिपक्ष, मर्यादा का पालन जैसे शब्द उन्होंने ऐसा लगता है मानो प्रधानमंत्री को नसीहत देने के लिए ही कहे हो। भागवत में कहा कि जो मर्यादा का पालन करते हुए कार्य करता है, अहंकार नहीं करता, वही सही अर्थों में सेवक कहलाने का अधिकारी है। प्रधानमंत्री मोदी पर विपक्ष हमेशा से अहंकारी होने का आरोप लगाता रहा है। भाजपा में भी कहा जाता है कि सरकार सिर्फ दो लोग मोदी और अमित शाह ही चलाते हैं। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि 2014 से 2019 तक जो सरकार भाजपा की थी। वो 2019 से 24 के बीच मोदी सरकार बनकर रह गई और 24 के चुनाव में तो गारंटी भी मोदी की दी जाने लगी यानी भाजपा पूरी तरह से गौण और मोदी प्रमुख हो गए। सत्ता में आने के बाद खुद को प्रधान सेवक बताने वाले मोदी के इस बार 400 के पार,लोग चुनाव के बाद विपक्ष को ढूंढेंगे,मोदी को कम मत आंकना,अपनी पर आ गया तो तुम्हारी( विपक्षी नेताओं ) की सात पीढियों की पोल खोल देगा,घमंडिया गठबंधन,एक-एक को जेल में डाल दूंगा जैसे नारे और चुनावी भाषण भी मोदी के इसी अहंकार के परिचायक माने गए । टीवी चैनल्स को दिए इंटरव्यू में खुद को भगवान का अवतार बताने,महात्मा गांधी को उनकी फिल्म आने तक कोई नहीं जानता था,जैसे वक्तव्य भी उनके इसी स्वभाव को दर्शा रहे थे। शायद मोदी को लगने लगा था कि उनके नेतृत्व में भाजपा चुनाव में कभी नहीं हारने वाली पार्टी बन चुकी है। लेकिन चुनावी नतीजों ने यह साबित कर दिया कि मतदाता,अहंकार किसी का बर्दाश्त नहीं करता है और भारत का चुनाव परिदृश्य अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होता है। जहां किसी एक नेता की गारंटी नहीं चलती। मोदी ने कई बार अपने भाषणों में भी ऐसी बातें कहीं,जिनकी प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति से उम्मीद नहीं की जाती है। क्या इसी पर भागवत ने अहंकारी होने की टिप्पणी की है?*
*प्रधानमंत्री मोदी अपनी चुनावी सभाओं में और इंटरव्यू में भी कई बार गलत तथ्य पेश करते हुए देखें और सुने गए हैं। चुनाव के दौरान ऐसे कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते रहे, क्योंकि मुख्यधारा के मीडिया की तो मोदी को उनकी गलतियां बताने की हिम्मत है नहीं। इसीलिए विपक्ष उन पर झूठ बोलने का आरोप लगाता है। अब भागवत ने कहा है कि चुनाव में मुकाबला जरूरी है और एक दूसरे को पीछे भी धकेलना होता है। लेकिन इसकी एक सीमा होनी चाहिए। यह मुकाबला झूठ पर आधारित नहीं होना चाहिए। भागवत ने यह भी कहा कि चुनाव में बहुमत के लिए प्रतिस्पर्धा जरूरी है, लेकिन यह चुनाव ऐसे लड़ा गया, जैसे युद्ध हो। दोनों पक्षों ने कमर कस कर हमला किया। इससे विभाजन होगा,सामाजिक और मानसिक दरारें बढेगी। इसमें कोई शक नहीं कि इस बार चुनाव में जितना हिंदू- मुस्लिम खुलकर हुआ और किया गया, पहले ना कभी हुआ है और न भविष्य में इससे ज्यादा होने की संभावना है। भाजपा ने जहां मुस्लिम आरक्षण को समाप्त करने को लेकर खुलेआम बयान दिए। मोदी ने तो हिंदुओं की संपत्ति छीनकर मुसलमानों को बांटने, मंगलसूत्र छीन लेने, ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले, घुसपैठिए जैसे भाषण दिए। वहीं विपक्ष अपने वोट बैंक के लिए मुसलमानों के रक्षण में लगा रहा। चुनाव परिणामों ने बताया कि इस बार मुसलमान ने जितना एक होकर मतदान किया, पहले कभी नहीं किया था। भाजपा को बहुमत से कम सीटें मिलने का एक बड़ा पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में मुसलमानों का थोक मतदान रहा। जो एकता मुस्लिम मतदाताओं ने दिखाई, वह जाति-वर्ग में बंटे हिंदू मतदाताओं में दूर तक नहीं दिखाई दी।*
*भागवत ने चुनाव के चौथे चरण के बाद भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के उस बयान का भी जवाब दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि शुरुआत में भाजपा सक्षम नहीं थी। तब हमें आरएसएस की जरूरत थी, अब हम सक्षम है। आज भाजपा खुद अपने आप चलती है। इसके जवाब में भागवत ने कहा कि चुनाव में अनावश्यक रूप से आरएसएस जैसे संगठनों को शामिल किया गया। लेकिन नड्डा के इस बयान का परिणाम भाजपा को भुगतना पड़ा है। लेकिन मणिपुर पर भागवत का बयान शायद देरी से आया है। उन्होंने कहा कि एक साल से मणिपुर शांति की राह देख रहा है।इस पर कौन ध्यान देगा, प्राथमिकता देकर उसका विचार करना होगा। सवाल ये है कि मणिपुर में हिंसा एक साल से जारी है और प्रधानमंत्री सहित कोई भी मंत्री वहां हालात का जायजा लेने नहीं गया है। तब भागवत ने इस बारे में क्यों नहीं पहले ही मोदी सरकार को नसीहत दी। अब क्या उनकी नसीहत के बाद मोदी मणिपुर का दौरा करेंगे।*
*इसमें कोई संदेह नहीं की मोदी सरकार और आरएसएस के बीच समन्वय और विश्वास कम हुआ है। लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद पिछले दिनों देश के सबसे बड़े समाचार पत्र दैनिक भास्कर एप पर एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। जिसमें संघ और भाजपा के बीच दूरियों के कारणों की विस्तृत जानकारी दी गई थी। जो प्रमुख कारण इस रिपोर्ट में सामने आए,वो ये थे। राम मंदिर पर संघ की हर सलाह को भाजपा ने हर स्तर पर खारिज किया। संघ चाहता था की राममंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को राजनीतिक नहीं, राष्ट्रीय आंदोलन बनाया जाए। यह हिंदुत्व और आस्था का मुद्दा है। प्राण प्रतिष्ठा लोकसभा चुनाव के बाद हो,क्योंकि चुनाव आते-आते लोग इस मुद्दे को भूल जाएंगे। संघ की सोच थी कि मंदिर बनने की आशा को बचाए रखना था, ताकि चुनाव के दौरान यह मतदाता के दिमाग में रहे। लेकिन भाजपा को जल्दी थी। इसलिए मंदिर की अधूरे निर्माण के बाद भी प्राण प्रतिष्ठा की गई। जिससे कई धर्मगुरु भी भाजपा के फैसले विरोध में आ गए। संघ की ये भी सलाह थी कि प्राण प्रतिष्ठा के मामले में शंकराचार्य और नाराज नहीं किया जाए और उन्हें आयोजन में शामिल किया जाए। साथ ही संघ कार्यक्रम में बॉलीवुड स्टार्स को न्यौता देने के खिलाफ था। वह नहीं चाहता था कि ऐसे धार्मिक आयोजन में ग्लैमर का तड़का लगे। राम मंदिर आंदोलन के अगुवा माने जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी को भी कार्यक्रम से दूर रखने और प्राण प्रतिष्ठा में मोदी खुद पूजा करें,इसका भी संघ विरोधी था। इसके अलावा भाजपा ने संघ की ओर से अतिथियों की दी गई सूची को भी नजर अंदाज कर दिया था। इसके अलावा संघ विपक्षी नेताओं के खिलाफ लगातार ईडी- सीबीआई के इस्तेमाल का भी विरोध कर रहा था। उसे लग रहा था कि इससे विपक्ष की छवि विक्टिम जैसी बन रही है और मोदी तानाशाह नजर आ रहे हैं। लेकिन भाजपा ने इस सलाह को भी नहीं माना। संघ ने दूसरे दलों के भ्रष्ट नेताओं को लगातार पार्टी में शामिल करने पर आपत्ति जताते हुए भाजपा को वॉशिंग मशीन नहीं बनने की सलाह दी थी,जिसे नहीं सुना गया। इसके अलावा संघ को मोदी सरकार और मोदी की गारंटी जैसे स्लोगन पर भी आपत्ति थी। यूपी के टिकट बंटवारे में भी संघ की उपेक्षा दूरियों की वजह रही।*
*देखना होगा पिछले 10 साल से सिर्फ मोदी और शाह की पार्टी बन गई भाजपा संघ प्रमुख भागवत की नसीहत को कितनी गंभीरता से लेती है। क्योंकि संघ के अघोषित असहयोग के बाद भी तीसरी बार भी केंद्र में सरकार तो मोदी की बन ही गई है। भले ही सूरत मोदी सरकार की जगह गठबंधन सरकार की हो गई हो। लेकिन मंत्रिमंडल गठन और विभागों के वितरण में मोदी का रूतबा तो नजर आ ही रहा है।*

*■ओम माथुर ■*
*9351415379*

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