जोडी का क्या महत्व है?

यह जगत द्वैत है। दो तत्वों से मिल कर बना है। दोनों का महत्व है। किसी एक को छोडा नहीं जा सकता। इसलिए जोडी की महत्ता है। जोड़ी का महत्व अलग-अलग संदर्भों में अलग अर्थ रखता है। आपको ख्याल में होगा कि सनातन धर्म में यज्ञ-हवन पूर्ण तभी होता है, जब यजमान जोडी में हो। इसका सबसे बडा उदाहरण है कि जब ब्रम्हाजी ने पुश्कर में सृश्टि यज्ञ किया तो उनकी पत्नी सावित्री के विलम्ब से आने पर मुहूर्त न टले, इसके लिए एक युवती गायत्री को साथ बैठा कर यज्ञ पूरा किया गया। लोकजीवन में जोड़ी केवल दो व्यक्तियों का साथ नहीं, बल्कि संतुलन का प्रतीक है। इसलिए कहा जाता है कि अकेला दीप हवा में बुझ जाता है, दो दीप साथ हों तो उजाला टिकता है। वस्तुतः जोड़ी जीवन की कठिनाइयों को साझा करने की शक्ति देती है। सामाजिक जीवन में इसकी अहमियत है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पति-पत्नी, दो दोस्त, गुरु-शिष्य व भाई-बहिन की जोडी है। इन सब रिश्तों में जोड़ी पूरकता का भाव दर्शाती है, एक की कमी दूसरा पूरी करता है। हिंदू दर्शन में शिव-शक्ति, प्रकृति-पुरुष, सूर्य-चंद्र यह बताता है कि सृष्टि द्वैत से चलती है। अकेला तत्व अधूरा है। इसी संदर्भ में रात-दिन, सुख-दुख का जिक्र किया जा सकता है। सूफी नजरिये में जोड़ी इश्क का प्रतीक है। बंदा और खुदा। यहां जोड़ी बाहरी नहीं, अंतर्मन की यात्रा है। कई कथाओं में कहा जाता है कि जो अकेला चलता है, वह जल्दी थकता है। जो जोड़ी में चलता है, वह दूर तक जाता है। इसलिए जोड़ी को भाग्य का सहारा माना गया।
व्यावहारिक जीवन में जोड़ी का अर्थ केवल विवाह नहीं, बल्कि जब ये संतुलन में हों, तभी जीवन फलता है। सिंधी लोक परंपरा में जोड़ी केवल पति-पत्नी का संबंध नहीं, बल्कि धर्म, भाग्य और लोक मर्यादा का संयुक्त स्वरूप है। तभी तो कहते हैं कि जोडियां भगवान बनाता है। यानि जोड़ी को ईश्वर की लिखावट माना जाता है, जिसे बदला नहीं, निभाया जाता है। लोकगीत कहते हैं, लाड़ी बिना लाड़ो अधूरो, लाड़े बिना लाड़ी लाचार।

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