फोडा घणी घालै!

हास्य-व्यंग्य

शिव शंकर गोयल
दिल्ली के चांदनी चौक इलाके, फतेहपुरी में फुटपाथ पर कुछ छोटे छोटे दुकानदार बैठते हैं, जो फटे-पुराने नोटों को बदलने का व्यवसाय करते हैं। आजकल उन्होंने अपनी अपनी दुकानों पर “यहां जख्मी एवं सीनियर नोट बदले जाते हैं” के बोर्ड लगा दिए हैं। इससे उनका धंधा भी चल निकला हैं। दिल्ली में ही जूतों की मरम्मत करने वालों कई लोगों ने फुटपाथ पर लगी अपनी दुकानों पर “शू डाक्टर” के बोर्ड के साथ-साथ “जख्मी जूतों का अस्पताल” के बोर्ड लगाये हुए हैं। वहां बैठे कई कारीगर, कभी कभी साथ में बैठे अपने साथी से सेकंड ओपिनियन भी ले लेते हैं। इन्ही बातों से उत्साहित होकर मैं आज अपने बैंक की शाखा में अपना एक फटा-पुराना नोट बदलवाने गया, लेकिन वहां मुझे एक से दूसरे काउंटर पर ऐसे भेजा गया, जैसे हॉकी में डिबलिंग करते हुए बॉल को पास ऑन किया जाता है। सच में देखा जाए तो मुझे अब ही पता लगा कि हॉकी हमारा राष्ट्रीय गेम क्यों है?
आज ही मुझे इस युक्ति की सच्चाई नजर आई, जो है तो राजस्थानी भाषा में, परन्तु इसे समझने में आपको भी कोई कठिनाई नही आएगी. युक्ति यों हैः-
“बिगड्योडो ऊंट, भीज्योडो ठूंठ, हिडक्योडो कुत्तो, पग म्है काठो जूतो,
अणजाण्यो संबंध, मुंहरी दुर्गंध, पुराणो जुखाम, पैस्योवालो नाम, फाट्योडो नोट, मूरख नै सपोर्ट, बिना सोच्या दियोडो वोट, फोडा घणी घालै.”

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