तुम आई नहीं प्रिय कहा रूक गई।आस मेरी धरी की धरी रह गई।।
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प्रेम की बात को मैं छुपाऊं केसे।
मेरी व्यथा को मैं बताऊं केसे।।
रात नींद न आई तेरी याद में,
ये आंखें खुली की खुली रह गई
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तेरा रूप सुंदर मोहक भा गया।
वीराने मन में बसंत छा गया।।
मैं पलके बिछा तेरी राह देखू,
आंख दर पे लगी की लगी रह गई
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अंतर्मन से तुझको चाहा मेने।
अपना दिल से मनहर माना मेने।।
लेकिन तूने अपना माना नही,
नैन झील सुखी की सुखी रह गई
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राह में चाह के दीपक जलाऐ।
करू इंतजार मगर तू न आए।।
मेरे प्यासे नैन में नमी रह गई,
प्रीत में धुंध जमी की जमी रह गई,
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गीतकार मनोहरसिंह चौहान मधुकर
जावरा जिला रतलाम,मध्य प्रदेश
मोबाईल नंबर 09131436100