(स्वामी विवेकानन्द जयंती-12 जनवरी 2026 : राष्ट्रीय युवा दिवस पर विशेष काव्य-रचना)
कलकत्ता की धरती से उठा,
नरेन्द्र एक ज्वाला बनकर जगा।
तर्क की आँखों में प्रश्न लिए,
हृदय में शिव का दीप जला।
माँ की भक्ति, पिता का विवेक,
संस्कारों ने गढ़ा महान स्वरूप।
शास्त्र, संगीत, दर्शन, विज्ञान,
सबमें था उसका अद्भुत रूप।
रामकृष्ण के चरणों में झुका,
अहं का बंधन वहीं पिघला।
गुरु-सेवा में स्वयं को खोकर,
उसने जग को स्वयं से जोड़ा।
केसरिया वस्त्र, नंगे पाँव,
भारत की धूल बनी पहचान।
ग्राम-ग्राम में पीड़ा देखी,
दुखियों में देखा भगवान।
शिकागो की सभा में गूँजा स्वर,
“मेरे अमरीकी बहनों और भाइयों!”
सहिष्णुता का शंखनाद हुआ,
मौन हुए धर्म के सारे द्वंद्व-छल।
नदियाँ जैसे सागर में मिलतीं,
वैसे ही सब पथ एक हैं।
यही वेदान्त, यही संदेश,
यही मानवता का सच है।
युवकों से थी उसकी आस,
उठो, जागो—यही पुकार।
सेवा ही धर्म, मानव ही ईश्वर,
यही था उसका जीवन-सार।
अल्प आयु, पर कार्य अनन्त,
युगों तक गूँजेगा नाम।
विवेकानन्द नहीं, वह चेतना है,
भारत की आत्मा, विश्व का प्रणाम।
रचियता/लेखक
– डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत
(Dr. Brahmanand Rajput)
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