विनायक दामोदर सावरकर एवं राष्ट्रनिर्माण का स्वदेशी यथार्थवाद

प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल
कुलगुरु
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर

भारत के वैचारिक इतिहास में यदि कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिनकी दृष्टि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित न होकर सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक पुनर्निर्माण तक विस्तृत रही, तो उनमें विनायक दामोदर सावरकर का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। सामान्यतः उन्हें एक क्रांतिकारी राष्ट्रवादी, प्रखर चिंतक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अग्रदूत के रूप में स्मरण किया जाता है, किंतु उनका आर्थिक चिंतन भी उतना ही सुदृढ़, यथार्थपरक और दूरदर्शी था। आज जब भारत आत्मनिर्भरता, उत्पादन-आधारित विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के नए युग में प्रवेश कर रहा है, तब सावरकर का आर्थिक दर्शन आश्चर्यजनक रूप से समसामयिक प्रतीत होता है।

राजनीतिक स्वतंत्रता का अनिवार्य आधार आर्थिक स्वतंत्रता

सावरकर का मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता किसी राष्ट्र को वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं बना सकती, जब तक वह आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर न हो। उनके विचार में “राजनीतिक दासता” का मूल कारण “आर्थिक निर्भरता” ही है। अतः उन्होंने बार-बार इस तथ्य पर बल दिया कि स्वराज्य तभी सार्थक होगा जब उसके साथ स्वावलंबन का भाव भी जुड़ा हो। यह दृष्टि आज के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जहाँ आर्थिक उपनिवेशवाद के नए रूप—तकनीकी निर्भरता, पूंजी प्रवाह की असमानता और उपभोग-प्रधान विकास मॉडल—विकासशील राष्ट्रों को पुनः पराधीन बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

आर्थिक नीतियों का नैतिक मानदंड राष्ट्रहित

सावरकर का आर्थिक दर्शन किसी वाद विशेष—पूंजीवाद या समाजवाद—की संकीर्ण सीमाओं में बंधा हुआ नहीं था। वे न तो अंध-पूंजीवादी थे और न ही राज्य-नियंत्रित समाजवादी व्यवस्था के समर्थक। उनका आग्रह था कि किसी भी आर्थिक नीति का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वह राष्ट्रहित में कितनी उपयोगी है। उनका यह दृष्टिकोण “राष्ट्रवादी उपयोगितावाद” की अवधारणा के रूप में समझा जा सकता है, जिसमें उत्पादन, वितरण और उपभोग के सभी साधनों का अंतिम लक्ष्य राष्ट्र की सामूहिक शक्ति और समृद्धि को बढ़ाना होता है।

औद्योगिकरण राष्ट्रीय शक्ति का आधार

सावरकर आधुनिक औद्योगिकीकरण के प्रबल समर्थक थे। वे मानते थे कि भारत को केवल कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था के रूप में सीमित रखना उसकी सामरिक और आर्थिक क्षमताओं को कमजोर करेगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—“जो राष्ट्र औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा है, वह युद्ध और शांति दोनों में ही पराधीन रहेगा।” इसलिए उन्होंने भारी उद्योगों, वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी शिक्षा के विस्तार पर बल दिया। उनके विचार में मशीनें मनुष्य की शत्रु नहीं, बल्कि उसकी उत्पादकता की सहायक हैं। यह दृष्टिकोण उस समय के कई स्वदेशी विचारकों से भिन्न था, जो मशीनों को पश्चिमी शोषण का प्रतीक मानते थे।

श्रम और पूंजी मे संबंध है, पारस्परिक सहयोग का

सावरकर ने श्रमिक और पूंजीपति के बीच वर्ग-संघर्ष की मार्क्सवादी अवधारणा को भारतीय संदर्भ में अनुपयुक्त माना। उनका मानना था कि श्रम और पूंजी एक-दूसरे के पूरक हैं, न कि विरोधी। उन्होंने “औद्योगिक समन्वय” की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ उत्पादन की निरंतरता और गुणवत्ता पर भी ध्यान दिया जाए। उनकी दृष्टि में हड़ताल और तालाबंदी जैसे उपाय अंतिम विकल्प होने चाहिए, क्योंकि इनसे राष्ट्र की उत्पादक क्षमता प्रभावित होती है। उन्होंने श्रमिकों से आह्वान किया कि वे अपने श्रम को केवल जीविका का साधन न मानकर राष्ट्र-सेवा का माध्यम समझें।

स्वदेशी का व्यावहारिक स्वरूप

सावरकर स्वदेशी के प्रबल समर्थक थे, किंतु उनका स्वदेशी भाव भावनात्मक बहिष्कार तक सीमित नहीं था। उन्होंने “व्यावहारिक स्वदेशी” की अवधारणा को विकसित किया, जिसमें विदेशी तकनीक और पूंजी का उपयोग तभी स्वीकार्य है जब वह राष्ट्र की उत्पादन क्षमता और आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करे। यह दृष्टिकोण आज की “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसी पहलों के साथ सहज रूप से मेल खाता है, जहाँ वैश्विक सहयोग को नकारा नहीं जाता, बल्कि उसे राष्ट्रीय हित के अनुरूप ढाला जाता है।

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

यद्यपि सावरकर औद्योगिकीकरण के समर्थक थे, उन्होंने कृषि क्षेत्र की उपेक्षा नहीं की। वे भूमि सुधार, सिंचाई सुविधाओं के विस्तार और कृषि-आधारित उद्योगों के विकास के पक्षधर थे। उनका मानना था कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केवल पारंपरिक खेती तक सीमित रखने के बजाय उसे आधुनिक तकनीक और विपणन सुविधाओं से जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने ग्रामीण कुटीर उद्योगों के पुनर्जीवन पर भी बल दिया, ताकि रोजगार के अवसर स्थानीय स्तर पर सृजित हो सकें और शहरों की ओर पलायन कम हो।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आर्थिक प्रगति

सावरकर का आर्थिक चिंतन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रेरित था। वे अंध-परंपराओं और अवैज्ञानिक मान्यताओं को आर्थिक विकास में बाधा मानते थे। उन्होंने शिक्षा प्रणाली में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को प्रमुख स्थान देने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार, आर्थिक प्रगति का मार्ग वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार से होकर ही गुजरता है। इसलिए उन्होंने तकनीकी संस्थानों की स्थापना और अनुसंधान-आधारित उद्योगों के विकास की वकालत की।

राष्ट्रीयकरण बनाम निजीकरण

सावरकर ने न तो पूर्ण राष्ट्रीयकरण का समर्थन किया और न ही अनियंत्रित निजीकरण का। उनका मानना था कि रक्षा, ऊर्जा और परिवहन जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में राज्य की सक्रिय भूमिका आवश्यक है, जबकि उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।यह संतुलित दृष्टिकोण आज के मिश्रित अर्थव्यवस्था मॉडल के अनुरूप है, जहाँ सार्वजनिक और निजी क्षेत्र मिलकर विकास की प्रक्रिया को गति देते हैं।

आर्थिक राष्ट्रवाद और वैश्वीकरण

सावरकर का आर्थिक राष्ट्रवाद संकीर्ण संरक्षणवाद का समर्थन नहीं करता था। वे वैश्विक व्यापार और तकनीकी आदान-प्रदान के विरोधी नहीं थे, किंतु उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते को स्वीकार करने से पूर्व उसके राष्ट्रीय हितों पर पड़ने वाले प्रभाव का गंभीर विश्लेषण किया जाना चाहिए। उनका मानना था कि आर्थिक वैश्वीकरण तभी लाभकारी हो सकता है जब वह आत्मनिर्भरता और उत्पादन-आधारित विकास को प्रोत्साहित करे, न कि केवल उपभोग-प्रधान बाजार का विस्तार करे।

उत्पादन का नैतिक आधार राष्ट्रधर्म

सावरकर ने आर्थिक गतिविधियों को नैतिक दृष्टि से भी परिभाषित किया। उनके अनुसार उत्पादन केवल व्यक्तिगत लाभ का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म का एक अंग है। उन्होंने उद्यमियों से आह्वान किया कि वे अपने उद्योगों को केवल लाभ-केन्द्रित न रखकर सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ संचालित करें। उनकी दृष्टि में कर-चोरी, भ्रष्टाचार और काला धन राष्ट्रद्रोह के समान हैं, क्योंकि ये राष्ट्र की सामूहिक संपत्ति को क्षति पहुँचाते हैं।

समकालीन संदर्भ में सावरकर का आर्थिक दर्शन

आज जब भारत “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य की ओर अग्रसर है, तब सावरकर का आर्थिक दर्शन नीति-निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है। उनकी “राष्ट्रहित-आधारित आर्थिक नीति” की अवधारणा हमें यह सिखाती है कि विकास का लक्ष्य केवल जीडीपी वृद्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति और सामाजिक समरसता का विस्तार होना चाहिए। डिजिटल अर्थव्यवस्था, हरित ऊर्जा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में निवेश करते समय यदि राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा जाए, तो विकास की प्रक्रिया अधिक समावेशी और टिकाऊ बन सकती है।

आत्मनिर्भरता से आत्मगौरव

सावरकर का आर्थिक दर्शन हमें यह संदेश देता है कि आर्थिक स्वाधीनता केवल संसाधनों की उपलब्धता से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र, अनुशासन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्राप्त होती है। उन्होंने जिस आत्मनिर्भर, उत्पादक और सशक्त भारत की परिकल्पना की थी, वह आज भी हमारे विकास-यात्रा का प्रेरक लक्ष्य बन सकती है।

इस प्रकार विनायक दामोदर सावरकर का आर्थिक चिंतन केवल ऐतिहासिक महत्व का विषय नहीं, बल्कि समकालीन नीति-निर्माण के लिए एक जीवंत मार्गदर्शक सिद्धांत है—जो हमें स्वदेशी यथार्थवाद के माध्यम से वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

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