“बुरा मानो होली है” – त्योहार की आड़ में छिपी हिंसा (त्यौहार, सहमती, गरिमा, आधिकार)

होली का दिन रंगों से खेलने के लिए मशहूर है, लेकिन कई लोग आज के दिन महिलाओं और लड़कियों, लड़कों के साथ रंग लगाने के बहाने छेड़छाड़ करते हैं। कई जगहों पर होली के नाम पर गोबर, कीचड़ आदि से भी होली खेली जाती है। “बुरा न मानो होली है” कहकर बहुत शर्मनाक व्यवहार करते हैं। दुख की बात है कि इसी उत्सव की आड़ में कई बार यौनिक हिंसा, छेड़छाड़ और अभद्रता को “मज़ाक” या “त्योहार की मस्ती” कहकर सामान्य बना दिया जाता है।
बरसों से एक वाक्य होली के साथ जुड़ा है — “बुरा न मानो होली है।”
लेकिन सवाल है: क्यों न मानें?
अगर किसी की देह, उसकी इच्छा और उसकी सीमाओं को तोड़ा जाए, तो वह “मस्ती” कैसे हो सकती है? “बुरा न मानो होली है” — यह वाक्य अक्सर हंसी-ठिठोली के रूप में बोला जाता है, लेकिन कई बार यह किसी की असहमति, असुविधा और गरिमा को कुचलने का बहाना बन जाता है। बिना पूछे रंग लगाना, जबरन पकड़ना या गंदे तरीके से छूना, शरीर के निजी अंगों को छूना या पकड़ना, गंदी टिप्पणियाँ करना, घूरना, ताड़ना, पानी के गुब्बारे मारना, जबरन किस/चूमने की कोशिश करना, भांग या शराब के नशे में सीमा लांघ जाना, किसी को नशे में धुत कर उसके साथ गलत व्यवहार करना-समाज में कई पुरुष तो यह सब प्लान करके करते हैं और त्यौहार की आड़ में बचने का बहाना बनाते हैं और कहते हैं: “भांग पी ली थी, पता नहीं चला।” लेकिन नशा किसी भी प्रकार की हिंसा का लाइसेंस नहीं है। शराब या भांग के प्रभाव में अपनी सीमाएं भूल जाना, दरअसल पहले से मौजूद सोच और प्रवृत्ति को उजागर करता है।
हमारे समाज में लड़कों को अक्सर यह सिखाया जाता है कि होली के दिन “छूट” है — छू लेने की, रंग डाल देने की, रास्ता रोक लेने की, कमेंट करने की, और फिर हंसकर कह देने की — “अरे त्योहार है!” यह छूट अचानक पैदा नहीं होती। यह उसी पितृसत्तात्मक सोच से आती है जहां: स्त्री की देह को सार्वजनिक समझ लिया जाता है, “ना” को चुनौती की तरह लिया जाता है, नशे को बहाना बना लिया जाता है, और भीड़ को जिम्मेदारी से मुक्त मान लिया जाता है।
त्योहार की आड़ में जो छेड़छाड़, जबरदस्ती या यौनिक हिंसा होती है, वह दरअसल हमारे समाज की गहरी जड़ें दिखाती है — जहां आनंद से ज़्यादा नियंत्रण और अधिकार की मानसिकता काम करती है।
यह सब “मस्ती” नहीं, बल्कि सहमति के बिना किया गया शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न है। त्योहार किसी को भी यह अधिकार नहीं देता कि वह किसी की देह, इच्छा या गरिमा पर कब्ज़ा कर ले।
यदि कोई व्यक्ति रंग नहीं खेलना चाहता, या केवल सूखी होली खेलना चाहता है, या सिर्फ़ चेहरे पर थोड़ा सा रंग लगवाना चाहता है — तो उसकी इच्छा का सम्मान करना ही असली उत्सव है। रंग लगाने से पहले पूछें — “क्या मैं आपको रंग लगा सकता/सकती हूं?”
जितनी सहमति, उतना ही रंग। किसी को जबरदस्ती पकड़कर रंग न लगाएं।
नशे में अपनी सीमाएं न भूलें। यदि आसपास कोई गरिमा का उल्लंघन करे, तो हस्तक्षेप करें।
हर व्यक्ति अपनी देह का मालिक है। किसी भी समय “ना” कहना उसका अधिकार है।
चुप्पी, डर या मुस्कान — सहमति नहीं है।
त्योहार रंगों का है, इसे गंदी सोच और जबरदस्ती से कलंकित न करें। क्योंकि सच्ची होली वही है, जहां हर रंग में सम्मान घुला हो। क्योंकि असली रंग वही है, जिसमें बराबरी और सम्मान घुला हो।
रंगों के इस पर्व पर, सामाजिक बदलाव की एक नई शुरुआत करें।
आप सभी को सुरक्षित, सम्मानजनक और सहमति वाली होली की शुभकामनाएं
रंग मुबारक!
 -आकाश पालीवाल
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