राजस्थान कांग्रेस रणभूमि बनी हुई है। खतरा डिजिटल खेल का है। तीर बाहर अंदर से चल रहे हैं। केंद्र में हैं गोविंद सिंह डोटासरा, जो अपने समर्थकों की हरकतों की हवा से घिरते हुए, धीरे-धीरे कमजोर पड़ते हुए और दूसरों को दरकिनार ठिकाने लगाने की कोशिश में खुद ठिकाने लगते हुए। यह परिदृश्य इसलिए बना क्योंकि उनके समर्थक, कांग्रेस के ही वरिष्ठ और दिग्गजों के विरोध में हवा बना रहे हैं, उनको तुच्छ बता रहे है और पार्टी विरोधी साबित करने का सामान सजा रहे हैं। घोषित किया जा रहा है कि राजनीति में सबसे जूनियर डोटासरा ही सबसे ताकतवर और सर्वश्रेष्ठ। बाकी किसी की कोई औकात नहीं। प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर बने रहने की यह ऐतिहासिक भूख है, जिसे इससे पहले इतनी हद तक गिरते हुए किसी ने नहीं देखा।
डोटासरा ताकतवर, बाकी सारे कमजोर
यह दृश्य अचानक गढ़ा गया है। डोटासरा समर्थकों की सक्रियता पर सवाल उठने लगे हैं। आखिर किसके खिलाफ और किसके इशारे पर? निशाने पर हैं अशोक गहलोत, सचिन पायलट और टीकाराम जूली। उनकी अपनी ही पार्टी के नेता। गहलोत पचास साल की राजनीति, 3 बार मुख्यमंत्री और 3 प्रधानमंत्रियों के साथ केंद्र में मंत्री, 2 बार प्रदेश अध्यक्ष, 3 बार एआईसीसी महासचिव, 5 बार सांसद और 6 बार विधायकी के अनुभव का विराट आकाश। मगर, डोटासरा समर्थक घोषित कर रहे हैं कि गहलोत का कोई जनाधार नहीं। सचिन पायलट – केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक उपमुख्यमंत्री रहे और अब राष्ट्रीय महासचिव।मगर, फतवा जारी कि पायलट का कोई राजनीतिक कद नहीं। निशाने पर टीकाराम जूली भी हैं। जूली विपक्ष के नेता, पूर्व मंत्री, दलित चेहरा और जमीनी राजनेता। मगर लगातार अवहेलना करके संदेश यही कि उनकी भी कोई सियासी हैसियत नहीं। खास बात यह है कि राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष डोटासरा खुद अपने नेताओं को बिल्कुल टारगेट नहीं कर रहे। वैसे भी, अभी वे उतने शक्ति संपन्न नहीं है।
कांग्रेस के फंड से ही कांग्रेस का नुकसान?
पिछले कुछ समय से, अचानक उग आए कई सारे सोशल मीडिया हैंडल्स सिर्फ और सिर्फ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डोटासरा को ही ताकतवर बताने पर आमादा है। खास बात यह भी है कि ये ज्यादातर नकली, फर्जी, छद्म और बेनामी सोशल मीडिया हैंडल्स उस हर नेता, कार्यकर्ता, समर्थक और यहां तक कि बुद्धिजीवियों, उद्यमियों, पत्रकारों और साहित्यकारों को भी केवल आरएसएस का एजेंट घोषित कर रहे हैं, जो गहलोत व पायलट को जानते हैं और नेता मानते हैं। इन बेनामी सोशल मीडिया हैंडल्स की विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली का नाम तक न लेने की अलग रणनीति है। रणनीति यही कि जूली की अवहेलना करके उनको बेकद का साबित करो और पराक्रमी पायलट व दिग्गज गहलोत पर सीधा निशाना यह यह सामान्य ट्रोलिंग नहीं है। संगठित नेटवर्क प्रबंधन है। शत प्रतिशत वॉर रूम स्टाइल। बेनामी प्रोफाइल्स, नैरेटिव सेटिंग। एक जैसे मैसेज और लक्ष्य केवल एक। डोटासरा ही सर्वश्रेष्ठ। ऐसे में, जरूरत यह समझने की है कि क्या कांग्रेस के संसाधन, कांग्रेस के ही बड़े नेताओं की छवि खराब करने और एक कमजोर व्यक्ति की छवि गढ़ने पर में झोंके जा रहे हैं?
सियासत की साजिश या ताकत का गणित
सियासत की घड़ी समय से तेज चलती है। कोई पद स्थायी नहीं होता। डोटासरा को प्रदेश अध्यक्ष बने 6 साल हो गया। जानते हैं कि तीन साल बाद विधानसभा चुनाव हैं। लेकिन राजनीति, तीन साल नहीं रुकती। आज कुर्सी गई, तो वापसी लगभग असंभव। नया अध्यक्ष चुनाव कराएगा और वही चेहरों का चयन करेगा। बेचैनी ने यहीं से जन्म लिया है। सियासत के इसी मोड़ से अपनों के खिलाफ यहीं से मुहिम बनी है। अपने नेताओं की छवि धुंधली करो। फिर कहो कि देखिए, विकल्प केवल डोटासरा है? यह रणनीति नहीं, साजिश है, जो संगठन विरोधी भी है और खतरनाक भी। डोटासरा शायद सोचते हैं यह शोर, समर्थन में बदलेगा। यह हमला, नेतृत्व में बदल जाएगा। लेकिन सियासत का गणित इतना सरल नहीं होता।
कुर्सी बचाने की कोशिश में कुर्सी ही कमजोर
नेतृत्व में लड़ाई होती है। लेकिन मर्यादा के भीतर। डोटासरा समर्थक समझे कि वरिष्ठों का सम्मान कमजोरी नहीं होता, संगठन की ताकत होता है। अगर वह टूटेगा तो ढांचा हिलेगा। डोटासरा की कुर्सी बचाने की यह लड़ाई ही कुर्सी ही छीन भी सकती है। उनके चारों तरफ सन्नाटा बढ़ रहा है। समर्थन, शोर में है। वरिष्ठ नेता खामोश हैं। लेकिन असहज हैं। कार्यकर्ता भ्रमित हैं और मतदाता देख रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष के समर्थक ही अपनों के खिलाफ साजिश रच रहे हैं। राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति यह होती है कि कोई नेता, भीड़ में अकेला हो जाए। और आज, अपने समर्थकों की हरकतों से गोविंद सिंह डोटासरा राजस्थान कांग्रेस में उसी मोड़ पर खड़े हैं। आपको भी लग यही रहा होगा
निरंजन परिहार
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)