आज भारत के पहले प्रधानमंत्री प जवाहरलाल नेहरू की पुण्य तिथि है। उन्हें याद करते हुए मैं राजनीति से इतर एक दृष्टा या पथ प्रदर्शक के रूप में देखता हूँ। अपनी कल्पना की उड़ान को जब देश की आजादी के मुहाने पर खड़ा करता हूँ तो भीतर तक सिहरन उठ जाती है.. कितना और क्या रोमांच कोलाहल, चिंताएं, चुनौतियां रही होगी.. !
उपनिवेशिक शासक के शोषण से मुक्ति का साकार स्वप्न अपने साथ विभाजन की विभीषिका और अभावों का सूखा समंदर भी लाया था। उन स्थिति में समाज और समृद्धि को एक साथ साधना किसी तप से कम नहीं रहा होगा।
बहुत संभव है, उनके स्थान पर कोई अन्य भी यह सब या इससे बेहतर कर सकता हो, लेकिन बदतर की आशंकाएं अधिक थी, क्योंकि राजनीति अपने मूल चरित्र में तात्कालिकता पर निर्भर रहती है। कितना आसान था उस समय बहुसंख्यक धार्मिकता को अपने पक्ष में करना, असफलताओं को अंग्रेजों की नीतियों से जोड़ना, आंसुओं का कवच बनकर आम जन की सहानुभूति बटोरना, चुनावी जीत की सतही उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटना (जैसा कि आजकल हो रहा है)।
लेकिन नहीं! उन्होंने यह सब नहीं किया। कर्मपथ को सामने रख आगे बढ़ते रहे। कहीं सफलता मिली, कहीं असलफता मिली। कहीं प्रशंसा मिली, कहीं आलोचना मिली। दोनों को गलाहार मनाकर स्वीकारा। विरोधियों को देशद्रोही नहीं कहा। विपक्ष को नकारा नहीं माना। कैबिनेट में विपरीत विचारधाराओं को उनकी योग्यता के हिसाब से कार्यभार सौंपा। यह सब करते हुए नेहरू उन नकरात्मक ताकतों से भी लडते रहे हैं जो धर्म, जाति या दूसरे हथियारों से देश के आंतरिक लय को तोड़ रही थीं।
यही सब कारण है कि मेरी वह पीढ़ी जो किताबों से अपना समय बटोर कर वर्तमान को आंकती है, नेहरू की कृतज्ञ हो जाती है और वह पीढ़ी जिसने किताबों से अधिक वाचाल भाषणों और लय तोड़ने वाली आवाजों पर यकीन किया नेहरू के विरोध में तर्क गढ़ने लगती है।
आश्चर्य होता है कि आजादी के समय देश में मात्र नौ विश्वविद्यालय हैं और नेहरू के दुनिया से जाते समय यह संख्या सैकड़ा पार कर लेती है ।कला, साहित्य, स्पेस, परमाणु, ऊर्जा, तकनीक, चिकित्सा, विज्ञान, के हर क्षेत्र से देश का भविष्य गढ़ा और यह भी बिना किसी तानाशाही या किसी वैश्विक शक्ति के पास अपनी गरिमा गिरवी रखे बगैर..। दरअसल, नेहरू एक ऐसा पथ हैं जो मानवीय गरिमा के साथ आगे बढ़ने की सुगम राह दिखाता है। यह आप पर है कि आप राह पर चलते है या उसे खोदकर गड्ढों भरा रास्ता बनाते हैं।
किसी भी कर्म का फलित पीढ़ियों भोगती हैं । नेहरू की उन नीतियों का फल हमें मिला कि मेरे पुरखे कच्चे मकानों में रहते थे और मेरी दीवारें मजबूत हो गई हैं। पुरखे बैलगाड़ियों में चलते थे, मेरे पास कार है।
नेहरू ना स्टालिन से डरते थे, ना अमेरिका से नजरे चुराते थे। वे अपने 162 देशों का नेतृत्व करते हुए सही मायने में वैश्विक व्यक्तित्व थे..जिनके होने का आज भी दुनिया प्रेरणा की तरह देखती है।
मुझे गर्व है कि मेरे स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री ऐसा व्यक्ति था जो आजादी, लोकतंत्र और मानवीय गरिमा का शिलालेख लिखकर दुनिया को उजाले का पता बता के गया।
*रास बिहारी गौड़*