चोर चुप ही रहता तो कम पिटता..यह लतीफा इस समय उन लोगों के लिए बड़ा मौजू बैठता है तो इन दिनों की महंगाई और आर्थिक बदहाली का अजब-गजब तर्कों से बचाव कर रहे हैं और अपना बिना बात मखौल उड़वा रहे हैं।
बहुत संभव है उन्हें मंहगाई से होने वाली दुर्गति का अहसास ना हो। अपने वातानुकूलित कमरों में बैठकर टीवी या मोबाइल की रील देख रहे हो या फिर उन्हें पूजास्थलों की भीड़ में अपना स्वर्ग नजर आ रहा हो या हो सकता है उन्होंने सोचने का सारा काम स्थगित कर रखा हो।
बात युद्ध या पेट्रोल की कीमतों से रोज होने वाली अनिवार्य दिक्कतों की नहीं हैं। सवाल, सवालों को दरकिनार कर कुतर्क गढ़ने का है।
राजनीति के दुराग्रह इतने प्रबल हो चुके हैं कि हम अपने ही विरुद्ध युद्ध में हथियार उठा चुके हैं।
प्रायोजित मीडिया से इतर सरकार के अपने नौकरशाह, आर्थिक सलाहकार, अर्थशास्त्री, निवेशक, शेयर बाजार और गिरता रुपया चीख चीख कर कह रहा है कि पिछले वर्षों की अविवेकी नीतियों ने बड़ा संभावित संकट खड़ा कर दिया है। लेकिन सरकार SIR और घुसपैठियों के गीत गाकर इस चीख का मजाक उड़ा रही है। वह नहीं जानती की ये चीखें कब्रों की रूदाली भर नहीं है ये जीते जागते इनसान की मजबूरियों का रुदन है। इसे आभासी मनाकर जो लोग अपने अज्ञान और असंवेदनशील होने का परिचय दे रहे हैं ..वे अपने लिए वह गड्ढा तैयार कर रहे हैं जिसमें पानी का अक्ष दिखाकर प्यास का सौदा किया जाएगा।
दुःख इस बात का है कि एक विशेष वर्ग राष्ट्रवाद की दुहाई देते हुए इस सबको जब जायज ठहराता है तब हम उस सच्चाई तक आराम से पहुंचते हैं कि जिसमें सदियों की गुलामी पुनः पुकारती नजर आती है,भले ही उसका चेहरा बाजार की किसी स्कीम में छिपा हो।
जब तर्क को अपने कुतर्क से काटते हुए अपने खोल में रहकर दूसरों के दर्द का उपहास उड़ाते हैं तब वह दुःख आपके दरवाजे से ज्यादा दूर नहीं होता।
खैर उनके लिए मंहगाई अच्छी है। युद्ध अच्छा है। नफरत अच्छी है। जब सब कुछ अच्छा है तो उनके लिए यही कहा जा सकता है- चोर चुप ही रहता तो कम पिटता…
रास बिहारी गौड़